मंच की भीड़ में खोता साहित्य – रीता गुलाटी ‘ऋतंभरा’

utkarshexpress.com – क्या साहित्य की आवाज़ सचमुच पाठक तक पहुँच रही है, या वह मंच की भीड़ में कहीं खोती जा रही है?
कहा जाता है—“साहित्य समाज का दर्पण है।” समाज में जो घटता है, उसकी छवि साहित्य में दिखाई देनी चाहिए। साहित्य केवल शब्दों का सुंदर संयोजन नहीं, बल्कि समय की धड़कनों को सुनने और उन्हें शब्द देने का माध्यम है। वह प्रश्न करता है, व्यवस्था को आईना दिखाता है और उस आवाज़ को सामने लाता है जिसे अक्सर भीड़ में सुनाई नहीं देती।
आज साहित्य लिखा जा रहा है। रचनाएँ प्रकाशित हो रही हैं, मंच सज रहे हैं, कवि-सम्मेलन और साहित्यिक गोष्ठियाँ हो रही हैं। तालियाँ भी बजती हैं और प्रशंसाएँ भी मिलती हैं। लेकिन मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है—क्या हमारा साहित्य उस समाज तक पहुँच पा रहा है, जहाँ उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है?
आज का युवा अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है। वर्षों की मेहनत, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और भविष्य के सपनों के बावजूद उसे शिक्षा और रोजगार के अवसरों को लेकर निराशा का सामना करना पड़ता है। आरक्षण की व्यवस्था को लेकर भी समाज में लंबे समय से बहस और अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। किसी को यह सामाजिक न्याय का आवश्यक माध्यम लगता है, तो किसी को अवसरों में असमानता का अनुभव होता है। सवाल यह है कि क्या साहित्य इन जटिल प्रश्नों पर तथ्य, संवेदना और संतुलित दृष्टि के साथ संवाद कर रहा है?
युवा बेरोजगारी से परेशान है। प्रतियोगिता लगातार बढ़ रही है। शिक्षा और रोजगार के अवसरों को लेकर उसके मन में अनेक प्रश्न हैं। वह अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। लेकिन क्या उसके इस संघर्ष को हमारी रचनाओं में पर्याप्त जगह मिल रही है?
इसी तरह न्याय व्यवस्था की धीमी गति भी आम नागरिक की चिंता का विषय है। वर्षों तक चलने वाले मुकदमे, तारीख पर तारीख और न्याय की प्रतीक्षा—ये सब हमारे समाज की वास्तविकताएँ हैं। साहित्य यदि केवल प्रेम, विरह, प्रकृति और व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित रह जाए और न्याय की प्रतीक्षा करते उस व्यक्ति की बेचैनी को शब्द न दे, तो क्या वह अपने समय के प्रति पूरी तरह ईमानदार कहा जा सकता है?
साहित्य का अर्थ केवल सुंदर लिखना नहीं है। साहित्य का दायित्व सुंदर के साथ-साथ सत्य को लिखना भी है। जो प्रश्न समाज को भीतर से आंदोलित कर रहे हैं, उन्हें उठाना भी साहित्य की जिम्मेदारी है।
हाँ, यह भी सच है कि किसी सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे पर साहित्यकार का काम किसी एक पक्ष का प्रचार करना नहीं, बल्कि सवालों को संवेदनशीलता और विवेक के साथ सामने रखना है। साहित्य को नारे से ऊपर उठकर मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
आज मंचों पर भीड़ है, लेकिन पाठक कहाँ है?
हमें यह सोचना होगा कि कहीं हम मंच की तालियों को साहित्य की सफलता का पैमाना तो नहीं मान बैठे? किसी रचना पर मिली तालियाँ क्षणिक हो सकती हैं, लेकिन वही रचना जब किसी पाठक के मन में प्रश्न पैदा करे, उसकी सोच बदले, उसे समाज के प्रति जागरूक करे—तभी साहित्य अपनी सार्थकता प्राप्त करता है।
साहित्य को मंच से उतरकर समाज के बीच जाना होगा। उसे खेतों, कारखानों, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, अदालतों, बेरोजगार युवाओं, संघर्ष करती स्त्रियों, अकेले बुजुर्गों और उन तमाम लोगों की आवाज़ बनना होगा, जिनकी बातें अक्सर मुख्यधारा के शोर में दब जाती हैं।
आज आवश्यकता ऐसी रचनाओं की है जो केवल वाहवाही न बटोरें, बल्कि व्यवस्था से प्रश्न करें और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ें।
क्योंकि साहित्य तब तक जीवित है, जब तक उसमें अपने समय की सच्चाई बोलने का साहस है।
मंच की भीड़ बहुत बड़ी हो सकती है,
पर साहित्य की असली मंज़िल मंच नहीं—पाठक का मन है।
और जब साहित्य पाठक के मन से जुड़कर समाज के प्रश्नों को आवाज़ देगा, तभी वह सचमुच समाज का दर्पण कहलाने का अधिकार पाएगा।
— रीता गुलाटी ‘ऋतंभरा’, चण्डीगढ़




