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राम नाम जपना, पराया माल अपना (व्यंग्य) – सुधाकर आशावादी

utkarshexpress,com – एक समय था कि जब बेरोकटोक महंगाई, रिश्वत खोरी और मुनाफ़ा खोरी को रोज़ की बात समझ कर राम नाम की लूट की संज्ञा दी जाती थी। लूट खसोट मचाने वालों की हरकतों पर ध्यान न देकर राम नाम जपना पराया माल अपना और राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट अंतकाल पछताएगा, जब प्राण जाएँगे छूट जैसी उक्तियों को महिमा मंडित किया जाता था। लूट चाहे कोई भी करे, उस लूट को राम जी के नाम से जोड़ दिया जाता था।
समय बदला राम जी के नाम पर मंदिर बन गया। राम जी चुनावी एजेंडे से भव्य मंदिर में विराजमान हो गए। तिरपाल से लेकर मंदिर तक का सफर आसान नहीं रहा। लम्बा संघर्ष हुआ। राम शिलाओं का पूजन हुआ। न जाने कहाँ कहाँ से राम शिलाएँ यात्रा करके मंदिर स्थल तक पहुँची। राम मंदिर का भव्य उद्घाटन हुआ, उद्घाटन में वे लोग सम्मिलित हुए, जिनकी राम जी के प्रति गहन आस्था थी। ऐसे लोग जान बूझ कर मंदिर के उद्घाटन में नहीं गए, जिन्हें राम जी राजनीति के ब्रांड एम्बेसडर प्रतीत हुए।
बहरहाल राम जी का मंदिर बना और राम जी चुनावी घोषणा पत्र के दायरे से बाहर हो गए। आस्था के सैलाब में अयोध्या नगरी जन जन की प्रिय बन गई। धार्मिक आस्थाएँ अपने आप में इतनी बड़ी होती हैं, कि उनके मुक़ाबले व्यक्ति किसी अन्य को कुछ नहीं समझता। राम जी की निकली सवारी, राम जी की लीला है न्यारी, जैसे उद्घोष जन जन के हृदय से गुंजायमान होने लगे। राम जी के भक्तों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। आस्था इतनी प्रबल कि भक्तों में होड़ मच गई, कि राम जी का खजाना भरा पूरा रहे। मंदिर की व्यवस्था में धन के भंडार कभी कम न हो। भक्तों की भीड़ राम जी के प्रति इतनी समर्पित हुई कि मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित,चाहता हूँ राम जी तुम्हें और क्या क्या सौंप दूँ मैं,जैसे भाव से भक्तों ने दान पेटियों को भरने में अपनी जेबें ख़ाली कर दी। दान पेटियाँ इतनी भरी,कि दान की वस्तुएँ, सोने चाँदी के आभूषण, नकदी की गिनती करने के लिए बैंक कर्मियों से लेकर विश्वास पात्रों की टीम का गठन करना पड़ा। व्यवस्थापकों ने चयन का क्या मापदंड रखा? यह तो वे जाने, कि दान की गणना करने वालों की ईमानदारी का परीक्षण किया गया या सिफारिश के नाम पर भाई भतीजा वाद को चयन का आधार बनाया गया,जो हुआ, सो हुआ, मगर विश्वास पर संदेह के बादल मंडरा गए।
हवा में खबर तैर गई कि राम जी के नाम पर लूट की जा रही है। सोने चाँदी की धातुओं सहित पत्र मुद्रा राम जी की तिजोरी की जगह किसी और की तिजोरी में स्थान पा रही हैं। मामला आगे बढ़ा, ऐसे ऐसे लोगों पर राम नाम की लूट का असर पड़ा, जिन्होंने राम जी के मंदिर में एक रुपए का सिक्का भी नहीं चढ़ाया था। उन्हें राम भक्तों ने सलाह भी दी कि सुन लो ऐ दीवानों तुम ये काम न करो, राम जी का नाम बदनाम न करो, मगर कोई सुने तब न ? जाँच समिति बना दी गई। दोषी कौन है कौन नहीं, कितनी चोरी हुई, कितना माल इधर से उधर हुआ, इसका खुलासा नहीं हुआ। कुछ कयास लगे, कुछ पर आरोप लगे, कुछ ने आरोप नकारे। मामला अधर में है। भक्त अब भी दान दे रहे हैं। उन्हें यकीन है कि राम जी सब देख रहे हैं। और शायद देख भी रहे हों। पर हिसाब मांगने वाला कोई नहीं। क्योंकि यहां राम नाम जपना का ठेका तो सबने ले लिया है लेकिन पराया माल अपना का हिसाब मांगने की हिम्मत किसी में नहीं। (विनायक फीचर्स)

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