मैंने देखा है जंतर-मंतर पर – प्रतिभा श्रीवास्तव

मैंने देखा है
जंतर- मंतर पर
असहमति को
अपशब्दों का उत्सव बनते हुए।
जंतर-मंतर की धरती पर
जब राष्ट्र के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि के लिए
गालियाँ नारे बन जाएँ,
तब आहत केवल एक व्यक्ति नहीं होता,
लोकतंत्र की भाषा भी घायल होती है।
क्या इतना भी तुम सब नहीं जानते….!
विरोध का अधिकार
लोकतंत्र का सबसे सुंदर आभूषण है,
पर जब वह
मर्यादा का परिधान उतार देता है,
तब उसकी प्रतिध्वनि
असहमति नहीं,
राष्ट्र की आत्मा में उतरती एक दरार बन जाती है।
देशद्रोह
सिर्फ़ सीमा लाँघने से नहीं होता,
कभी-कभी
अपने ही लोकतंत्र की गरिमा को
अपशब्दों से लहूलुहान कर देना भी
राष्ट्र के सम्मान के विरुद्ध खड़ा होना है।
कुछ प्रतिशत युवाओं ने
पूरी पीढ़ी को
कटघरे में खड़ा कर देने जैसा
निंदनीय अपराध किया है।
आज राष्ट्र आहत है…
उसके माथे पर लगे इस कलंक पर
कौन-सा मरहम रखूँ,
समझ नहीं पा रही हूँ।
– प्रतिभा श्रीवास्तव , भोपाल मध्य प्रदेश




