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बूँदे – सविता सिंह

 

यह बारिश की बूँदे

फूलों की पंखुड़ियों पर

औऱ पत्तों पर।

कितनी खूबसूरती से,

पत्तों ने उन बूँदों को

अपने वक्ष में समेटे हुए है।

जैसे की काफ़ी दिनों बाद

सीमा के प्रहरी अपने घर

पत्नी को अपने अंक में भरा हो।

जैसे की स्वाति नक्षत्र की बूँद

सीप के पाश में मोती बन जाती हैं।

जैसे कि प्यासा पपीहा बूँद पाकर

बारिश कि वह संपूर्ण हो गया।

जैसे की उर्मि का इंतज़ार ख़त्म हुआ।

उफ्फ्फ ये नाजुक पारदर्शी बूँद को

मनचाही मंज़िल मिली।

सविता सिंह मीरा,जमशेदपुर

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