मनोरंजन
आवाज़ तुम्हारी – अनिल भारद्वाज

यादों के इस रंगमहल में,
गूंज रही आवाज तुम्हारी।
तुम जिस बगिया के माली थे
उसकी पंखुड़ियां रोतीं हैंं,
उन्हें देखकर धरा गगन की
पलके भी गीली होती हैं।
घर के द्वार झरोखों में से
झांक रही आवाज तुम्हारी।
अनायास ही यूं चल दोगे
कभी नहीं सोचा था मन में,
और कभी भी नहीं दिखोगे
इन आंखों को इस जीवन में।
कभी दूर से कभी पास से
बुला रही है आवाज़ तुम्हारी।
अपने चित्रों की चौखट से
एक बार बाहर आ जाते,
अपनी कृतियों में से कोई
गीत सुनाने को आ जाते।
तस्वीरों की मालाओं से
झांक रही आवाज तुम्हारी।
– अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर.




