राजनीतिक

चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता,पवित्रता और पारदर्शिता ही लोकतंत्र की सार्थकता – विवेक रंजन श्रीवास्तव 

utkarshexpress.com – लोकतंत्र की आत्मा उसकी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पवित्रता में बसती है। यदि जनता का विश्वास चुनाव और उसके परिणामों से उठने लगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ने लगती है।
वर्तमान दौर में भारत सहित दुनिया के विभिन्न भागों में चुनावी पारदर्शिता को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। इस बहस के केंद्र में हैं हमारे विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे सवाल और जेन जी यानी आज की युवा पीढ़ी का सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक होता उग्र प्रदर्शन है।
विपक्षी दलों की मुख्य चिंताएं इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता, वीवीपीएटी की पर्चियों के शत-प्रतिशत मिलान और मतदाता सूचियों में होने वाली कथित गड़बड़ियों को लेकर रही हैं। इन आशंकाओं के निवारण के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया गया है, ताकि चुनाव संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। इसी बीच, डिजिटल युग की युवा पीढ़ी ने लोकतंत्र के इस विमर्श को एक नया मोड़ दिया है। यह पीढ़ी केवल मूकदर्शक बनकर रहने के बजाय अपने अधिकारों, निष्पक्ष रोजगार नीतियों और पारदर्शी संस्थागत प्रक्रियाओं की मांग को लेकर मुखर रूप से सामने आ रही है।
वैश्विक परिदृश्य से लेकर देश के भीतर तक, युवाओं के ये प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की अपारदर्शिता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
वास्तव में, चुनाव प्रक्रिया को निर्बाध और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए केवल तकनीकी सटीकता ही नहीं, बल्कि जन-विश्वास की सुदृढ़ता भी उतनी ही आवश्यक है। इसके लिए वीवीपीएटी पर्चियों की पारदर्शी जांच, चुनावी संस्थाओं की पूर्ण स्वायत्तता और चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता जैसे कदम बेहद जरूरी हैं। चुनाव केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह जनता के जनादेश का जीवंत प्रतिबिंब होता है। ऐसे में विपक्षी दलों के प्रश्न और युवाओं के आंदोलन लोकतंत्र के लिए किसी खतरे के बजाय चुनावी सुधारों का एक ऐतिहासिक अवसर बन सकते हैं।
एक जीवंत लोकतंत्र तभी फल-फूल सकता है जब हर नागरिक को यह अटूट भरोसा हो कि उसका वोट सुरक्षित है और निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष है। (विनायक फीचर्स)

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