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जिंदगी की तपन – जितेंद्र कुमार

रेत पर नाम वें मेरा लिखते रहें,
हर दफा सागर उसको मिटाते रहेंl
मैंने उनसे कहाँ पत्थरों पर लिखो,
पत्थरों पर लिखें लब्ज़ मिटते नहीं
उसके हर शब्द मीठे गज़ल बन गयें,
दिल में जो दर्द थे सब अज़ल बन गयें ।
उसने छुआ मुझे, तो ऐसा लगा,
जैसे रूखे मौसम भी मखमल बन गयें ।
ग़म के जितने समंदर थे,थल बन गए,
बीते लम्हे जो सोए थे, कल बन गए।
उसकी आँखों में देखा तो ऐसा लगा,
अजनबी थे जो चेहरे, पुराने हुए।
अब न शिकवा हवा से,न तूफ़ान से,
हम गुज़रने लगे हर इम्तिहान से।
जिंदगी को मिला एक नया रास्ता,
हम चले जब भी उसके ही विश्वास से।
उसकी साँसों की महक से महकने लगे,
हम जो ख़ामोश थे, अब चहकने लगे।
ज़िंदगी की तपन भी सुहानी लगी, 2
ज़ख़्म जितने पुराने थे, भरने लगे।
– जितेंद्र कुमार, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश




