जीवन बहुत सुंदर है, हम उसे दुविधापूर्ण बनाते हैं – प्रदीप सहारे

utkarshexpress.com – अक्सर शादी के बाद के दो-तीन साल बहुत ही सुखमय होते हैं। इन लम्हों का हर एक पल सुखद अनुभूति दे जाता है। रात-रात भर बातें करना, हाथ में हाथ डालकर घूमना, भविष्य के सपने देखना और बहुत कुछ।
लेकिन कुछ ही दिनों में यह दिन खत्म हो जाते हैं और घूमने-फिरने और मौज-मस्ती में कुछ बैंक बैलेंस भी कम हो जाता है।
जीवन के इस सुंदर सफर में, भविष्य की योजना के अनुसार कुछ ही दिनों में एक नए मेहमान के आने की हलचल लगती है और साल भर बाद एक नए मेहमान का आगमन होता है।
बस, उसके बाद क्या ! सारा समय, सारा ध्यान उस नए मेहमान पर केंद्रित हो जाता है। उसके साथ खेलना, उठना, बैठना, उसके कपड़े, शी-शू। उसको प्यार करते और उसके तुतलाते बोल सुनते-सुनते समय कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।
इस बीच श्रीमती का हाथ कब छूट जाता है, पता ही नहीं चलता और रात भर बातें करना, घूमना-फिरना, यह तो कब का बंद हो चुका होता है। लेकिन यह बातें दोनों के ध्यान में कभी आती ही नहीं।
इस तरह उम्र के तीसवें पड़ाव पर पहुँच जाते हैं।
बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते हैं। श्रीमती उसकी देखभाल में व्यस्त, हम अपने काम में व्यस्त। किसी को किसी से शिकवा करने की फुरसत कहाँ?
घर का लोन, गाड़ी का लोन, उसकी EMI, बच्चे की जिम्मेदारी, उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य। अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने के चक्कर में अपने आप को काम में पूर्णतः झोंक देते हैं।
बच्चे का स्कूल में एडमिशन होता है। वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है और श्रीमती का समय उसका खाना-पीना, पढ़ाई, स्कूल लाना-ले जाना, इसमें निकल जाता है।
अब तक उम्र के पैंतीसवें पड़ाव पर पहुँच गए होते हैं। बोलने के लिए खुद का मकान, गाड़ी और थोड़ा बैंक बैलेंस भी रहता है। लेकिन फिर भी कुछ कमी महसूस होती रहती है। वह क्या है, समझ में नहीं आती और उसे समझने के चक्कर में मन अशांत रहता है।
चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है, जबरदस्ती घर में, ऑफिस में चिल्लाना, न जाने क्या-क्या…
परिणामस्वरूप वीकेंड पर एक पैग की शुरुआत और दोनों के बीच बातचीत की दरमियान बढ़ जाती है।
इसी तरह दिन निकलते जाते हैं। बच्चा बड़ा होता है, उसका अपना एक विश्व तैयार होता है। वह दसवीं में पहुँच जाता है और दोनों की उम्र चालीस पार। साथ बढ़ता है थोड़ा बैंक बैलेंस।
एक दिन फुरसत के क्षण में पुराने दिनों को याद करते हुए वह उसे प्यार से बुलाता है।
“अरे, आ न जरा बात करते हैं। साथ बैठ, हाथ में हाथ डालकर। चलो कहीं बाहर चलते हैं, घूमते हैं, बातें करते हैं।”
उसे आश्चर्य होता है। विस्मित नजर से देखती है और कहती है,
“अजी, आपको भी मजाक सूझता है! अब हम चालीस पार कर चुके हैं। घर में बहुत काम पड़े हैं, वह कौन करेगा?”
यह कहकर वह साड़ी का पल्लू कमर में कसकर किचन की ओर निकल जाती है।
अब उम्र के पैंतालीसवें पड़ाव पर पहुँच चुके होते हैं। आँखों पर चश्मा, चेहरे पर कुछ झुर्रियाँ दिखने लगती हैं। सफेद बाल अपना विस्तार करते हैं। बच्चा कॉलेज में और बैंक बैलेंस बढ़ता रहता है।
बच्चे की सुख-समृद्धि के लिए उसका मंदिर जाना और इसका वीकेंड में दो बार पीना चालू रहता है।
अब बच्चे की पढ़ाई खत्म और वह अपने पैरों पर खड़ा होता है। उसका अपना एक विश्व निर्माण होता है। उसे पंख निकल आते हैं और एक दिन वह विदेश चला जाता है।
समय अपनी गति नहीं छोड़ता। अब सफेद रंग के बाल साथ छोड़ने लगते हैं। वह उसे बुढ़िया लग रही हो कहता है, क्योंकि अब खुद बूढ़ा हो जाता है।
उम्र का पड़ाव पचपन से साठ की तरफ बढ़ने लगता है। अब बैंक में कितना बैलेंस है, याद नहीं रहता। याद रहता है दवा-दारू का टाइम, डॉक्टर की अपॉइंटमेंट। वीकेंड का कार्यक्रम कब का बंद हो चुका होता है।
लड़का बड़ा होकर घर में रहेगा, इस उद्देश्य से लिया चार-पाँच कमरे का घर अब बेकार लिया, ऐसा लगता है।
“अब वह घर कब आएगा, इसका इंतजार करना ही उसके बस में रहता है।”
एक दिन शाम का समय। वह अपने घर के झूले में बैठे-बैठे कुछ सोचते रहता है। श्रीमती भगवान के पास दीया-बत्ती करती रहती है।
अचानक फोन की घंटी बजती है। वह फोन उठाता है। फोन लड़के का रहता है। उधर से आवाज आती है। लड़का कहता है,
“पापा, मैंने शादी कर ली है और अब मैं यहीं पर रहने वाला हूँ। माँ को समझा देना।”
वह कहता है,
“अरे बेटा, सुन तो! मैंने तेरे लिए इतना बड़ा मकान लेके रखा है। बैंक में कुछ पैसा भी है। उसका मैं क्या करूँगा?”
लड़का कहता है,
“पापा, यह अब मेरे लिए शून्य है। मेरी मानो तो उसे वृद्धाश्रम को दान कर दो और आप दोनों भी चले जाओ। अच्छा भी लगेगा और टाइम भी कटेगा।”
इतना कहकर फोन काट देता है।
उसे क्या करे, समझ नहीं आता। वह सोचने लगता है। झूला मंद गति से झूलता रहता है।
वह फिर झूले पर आकर बैठता है। उसकी भी दीया-बत्ती खत्म होती है। वह आवाज देता है,
“अरे, आ न थोड़ा साथ बैठते हैं, बात करते हैं, हाथ में हाथ डालकर।”
वह कहती है,
“बस, एक मिनट में आई।”
यह सुनकर उसका चेहरा आश्चर्यचकित हो जाता है। उसके हृदय की स्पंदन बढ़ जाती है। दबे आँसू बाहर आते हैं। उनमें से एक गाल पर आकर रुक जाता है और आँखों का तेज कम होते-होते निस्तेज हो जाता है।
अब वह अपना काम खत्म करके उसके पास आकर बैठती है और कहती है,
“बोलिए, क्या कहना चाहते थे आप? कहाँ जाना है, क्या बात करनी है?”
ऐसा कहते हुए उसका हाथ अपने हाथ में लेती है। ठंडे हाथ का स्पर्श होता है। वह एक क्षण के लिए सुन्न हो जाती है। फिर सँभल जाती है।
उठकर भगवान के पास जाती है, अगरबत्ती लगाकर फिर झूले पर आकर उसके पास बैठती है और कहती है,
“बोलिए, कब, कहाँ, कैसे जाना है? चलो, जल्दी वहाँ चलकर खूब बातें करेंगे, हाथ में हाथ डालकर।”
ऐसा कहते हुए उसके भी हृदय की स्पंदन बढ़ जाती है और गर्दन झुक जाती है।
इसलिए कहता हूँ, बैंक बैलेंस में शून्य मत बढ़ाओ, नहीं तो जीवन शून्य हो जाएगा।
क्योंकि, “जीवन बहुत सुंदर है।”
(Life is beautiful we make it complicated,जीवन बहुत सुंदर है, हम उसे दुविधापूर्ण बनाते हैं )
✍️ प्रदीप सहारे- नागपुर, महाराष्ट्र




