शहर डूबने का सच: नाले नहीं, हमारी आदतें जाम हैं – इंजी. कवि अतिवीर जैन “पराग

utkarshexpress.com – पांच या दस मिनट की थोड़ी तेज बारिश और पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। नाले और सड़कें पानी से लबालब हो जाती हैं। लगता है पूरी सड़क पर तालाब या नदी बह रही है। नालियां ओवरफ्लो हो जाती हैं। नालों और सड़कों का पानी लौटकर गलियों में आने लगता है। गली-मोहल्ले पूरे पानी में डूब जाते हैं। दो-दो फीट पानी भर जाता है। और तो और, निचली बस्तियों के अधिकतर मकानों में तो घरों के अंदर भी पानी भर जाता है।
मेरठ, दिल्ली, मुंबई, पुणे, भोपाल, लखनऊ, कानपुर… हर शहर का यही हाल है। लोग परेशान हैं। क्या समाधान है? हर समस्या की जड़ आदमी है और समाधान भी आदमी ही है।
जैसे ही जलभराव होता है, हम नगर निगम और निर्माण विभाग कोसने लगते हैं – टूटे मैनहोल के लिए, भरे हुए नालों के लिए। पर हम भूल जाते हैं कि ये नाले-नालियां जो भरी हुई हैं, इन्हें नगर निगम वालों ने आकर नहीं भरा। हमने ही भरा है।
दशकों से सरकार प्लास्टिक हटाओ की मुहिम चला रही है, पर सरकार कभी भी प्लास्टिक की पन्नी बनाने वाली फैक्ट्रियों को बंद नहीं करवाती। अब यह सरकार की महानता है या दोगलापन, आप तय करें। हर साल कुछ दिन पन्नी वालों के लिए सब्जी के ठेलों और दुकानों पर चेकिंग अभियान चलाया जाता है। टार्गेट पूरा होते ही यह अभियान ठप हो जाता है। फिर वही ‘ढाक के तीन पात’। सब कुछ वैसे ही चलता रहता है।
पन्नियां ही नालों-नालियों के जाम होने और पानी भरने की मूल जड़ हैं। नगर निगम और नगरपालिका की जिम्मेदारी इन्हें साफ रखने की है। इसके लिए आप और हम बाकायदा टैक्स भी भरते हैं।
अब इस समस्या से निपटने के लिए हमें खुद जागना होगा। बाजार जाते समय कपड़े का थैला या जूट का थैला ले जाना होगा। पन्नियों को ‘बाय-बाय, टाटा’ कहना होगा। जब हम पन्नियां लेना बंद कर देंगे, तो दुकानदार खुद ही पन्नियों में सामान देना बंद कर देंगे। मेरी कई दुकानदारों से बात हुई है। वे कहते हैं, “हम क्या करें, हर ग्राहक पन्नी में सामान मांगता है। कागज के लिफाफे में सामान लेने से मना करता है।”
नगर निगम और अन्य संस्थाओं को भी अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। हर साल स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। सरकार एक इंजन की हो, दो इंजन की या तीन इंजन की, कोई फर्क नहीं पड़ता। बादलों को थोड़ी पता है किसकी सरकार है। उन्हें तो बरसना ही है।
हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम पन्नियों का उपयोग न करें। पन्नी में कूड़ा भरकर नालियों-नालों में न डालें। हम नालों और नालियों पर अतिक्रमण न करें, जिससे सफाईकर्मी आसानी से सफाई कर सकें। हमें खुद जागना होगा, तभी इस समस्या से निदान पाया जा सकता है।
“आप डूबे तो जग डूबा, आप उभरे तो जग उभरा।”
तो उभरो मेरे शहर के नागरिकों और समस्या से निदान पा लो। (लेखक: रक्षा मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक)(विभूति फीचर्स)




