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कृषि लोक गीत (भोजपुरी) – श्याम कुमार भारती

 

अबले कटल नाही खेतवा के सब धनवा हो,

ज़ननवा मनवा रसल हमरो।

 

जब जब धन कटनी के मनाई,

देहली हमके धकियाई।

मंगली सोनवा के कंगनवा हो,

जननवा मनवा रसल…….।

 

एक त मेहरारू बाड़ी रूसल,

दूजे बरखा खूब बरसल।

पनिया डुबले सगरों धनवा हो,

जननावा मनवा रूसल ……..।

 

बेची के धनवा कंगनवा गढ़ाईब,

सोनवा के कंगनवा तोहके पहिनाइब।

खइबू कइसे थरिया में भोजनवा हो,

जननवा मनवा रूसल ………।

 

चला चली के धन कटनी कईल जाई,

देशवा खातिर अनाज दिहल जाई।

भरपेट ख़इहे लोगवा हिन्दुस्तनवा हो,

जननवा मनवा रूसल हमरो।

– श्याम कुंवर भारती, बोकारो,झारखंड

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