क्या पुलिस पिटने के लिये ही है – प्रवीण त्रिपाठी

utkarshexpress.com दिल्ली – अगर उपद्रवी संसद तक पहुंच जाते या अन्दर घुस जाते तब आपको शांति मिलती?? अपनी साहित्य धर्मिता दिखाने के लिए कोई और विषय चुनिये आदरणीय।
कृपया सुरक्षाबलों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठा कर उनके उत्तरदायित्व में बाधा मत डालिये और न ही उनका मनोबल गिराइये। सैकड़ों वीडियो वायरल हैं जिनमे सुरक्षाबलों को provoke किया जा रहा है या उनकी खिल्ली उड़ाई जा रही है।
अगर सुरक्षाबल निष्क्रिय हों तो भी परेशानी, अगर minimum force use की जाए तो भी परेशानी। क्या सुरक्षाबलों ने आरम्भ से ही बल प्रयोग किया(आपके शब्दों में “डंडे” का प्रयोग किया?)
क्या आपने वह वीडियो नहीं देखा जिसमें एक अराजक तत्व बैरियर पर तैनात सुरक्षाकर्मी की आँखों मे पेपर स्प्रे का SPRAY नहीं किया जिसके बाद उस पर डंडा चला। क्या आपने वह दृश्य भी नहीं देखा जिसमें संसद से पहले लगाये गए बैरिकेड्स को पहले कुछ अराजक तत्व लांघने लगे और बाद में सैकड़ों की तादात में उपद्रवी बैरियर के ऊपर से फिर उनको गिरा कर संसद की ओर बढ़ने लगे थे।
ऐसे में क्या पुलिस मूकदर्शक बनी रहती? अगर समय से और समुचित बल प्रयोग किया होता तो 118 के आसपास पुलिसकर्मियों की दुर्दशा भीड़ के द्वारा नहीं होती। सेना में सेवाकाल के दौरान अनेक बार कश्मीर और मणिपुर – नागालैंड में ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, यहां तक कि सुरक्षकर्मियों के हथियार छीनने के प्रयास होते थे ताकि वे रियेक्ट करें फिर VICTIM CARD खेला जा सके।
एक साहित्यकार , सजग और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सबका कर्तव्य है कि समाज का सही ढंग से मार्गदर्शन करें और ऐसा प्रयास करें कि सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़े और वह अपना कार्य सही ढंग से कर सकें न कि व्यंग्य जैसी विधा का प्रयोग करके उन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करके उनका मनोबल गिरायें आखिरकार ये सुरक्षाकर्मी ही हैं जिनके पास मुसीबत पड़ने पर हम सबसे पहले जाते हैं।
एक बात और –
अगर डंडा चलता तो उपद्रवी लालकिले पर नहीं चढ़ जाता।
अगर डंडा चलता तो दो वर्ष तक दिल्ली बंधक नहीं बनी रहती।
और अंत में
यह डंडा ही है जिससे उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार हुआ है।
सबकी विचार धाराएँ भिन्न हो सकती हैं पर एक बात पर सबको एक मत होना पड़ेगा कि सुरक्षा या सुरक्षकर्मियों की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह किसी भी माध्यम से नहीं लगने चाहिये। जिस दिन डंडे (सुरक्षाबलों) का भय समाप्त हुआ उस दिन देश अराजकता का शिकार होगा और हमारे घर भी सुरक्षित नहीं रह सकेंगे।
ऐसी परिस्थितियों से रूबरू होने के अनुभव के आधार पर मैंने एक रचना लिखी थी, आप तथा आपके और मेरे मित्र भी देखें, गुनें और तब मन्तव्य प्रकट करें:-
“”शीर्षक : सुरक्षकर्मियों की विडंबना
शस्त्र बल, सब को सुहाते किसलिये।
मान के सब गान गाते किसलिये।1
ढेर सारे, क्षेत्र जब व्यवसाय के।
मौत से पंजा लड़ाते किसलिये।2
हर विपद में, सैनिकों को याद कर।
बाद में उनको भुलाते किसलिये।3
शौर्य गाथाएँ लिखें निज रक्त से।
जिंदगी धूमिल कराते किस लिये।4
कर्म में उनके न कोई खोट है।
दाग शुचिता पर लगाते किसलिये।5
राष्ट्र रक्षा सैन्यबल की सोच में।
सिरफिरे गाली सुनाते किसलिये।6
हर सिपाही, चाहता सम्मान जब।
योग्यता पर, शक़ जताते किसलिये।7
ज्वार उमड़े, जोश का बलिदान पर।
वीरगति को भूल जाते किसलिये।8
याद रहती, है शहीदी चार दिन।
परिजनों तक, को भुलाते किसलिये।9
राष्ट्र सेवा बाद लौटें जब कभी।
ठोकरें उनको खिलाते किसलिये।10
हर सिपाही धर्म से निरपेक्ष है।
स्वार्थवश मुहरा बनाते किसलिये।11
– प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, उत्तर प्रदेश



