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दीपक नहीं तू – प्रदीप सहारे

दीपक नहीं तू, दीमक है,

दीपक का काम है,

अँधेरे में राह दिखलाना,

भटके हुए को,

जगह पर पहुँचाना।

अपना काम भूल गया तू,

दीपक नहीं, दीमक है तू।

 

राजनीति के संग प्यादे,

भूल गया तू अपने वादे।

चाक-चौबंद को भा गया,

अपना अस्तित्व खो गया।

चाट गया तू भविष्य युवा,

जो खेले तेरे संग जुआ।

भाग रहे अब यहाँ-वहाँ,

दीपक नहीं, दीमक है तू।

 

चार दिन रहा अमेरिका,

रहकर वहाँ कुछ न सीखा।

आता सीखकर कुछ बातें,

याद करते भाग्य-विधाता।

बुझे दीपक को मारेंगे ठोकर,

बनकर घूमेगा अब जोकर।

याद रखना अब बात यह तू,

दीपक नहीं, दीमक है तू।

✍️ प्रदीप सहारे, नागपुर, महाराष्ट्र

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