हिंदी-उर्दू साहित्यिक संस्था समर्पण की रचनात्मक गोष्ठी का सफल आयोजन आसारा हाउस में हुआ

utkarshexpress.com मुजफ्फरनगर – मुजफ्फरनगर के साथ-साथ शामली एवं बिजनौर जनपदों से आए शायरों व कवियों एवं साहित्यकारों ने गोष्ठी में शिरकत की।
इस अवसर पर साहित्य, हिंदी-उर्दू भाषा तथा आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने पर विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया तथा सभी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्यिक माहौल को खुशनुमा बनाया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कवि, शायर एवं साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। आयोजन ने हिंदी और उर्दू साहित्य की साझा संस्कृति और आपसी प्रेम का सुंदर संदेश दिया। तहसीन अली असारवी गोष्ठी के संयोजक रहे । शायरों व कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। अध्यक्षता गीतकार ईश्वर दयाल गुप्ता और संचालन डॉ आस मोहम्मद अमीन ने किया।
डाक्टर वीना गर्ग की सरस्वती वंदना और मास्टर कलीम त्यागी की नाते पाक से गोष्ठी का शुभारंभ किया गया कविता ओ और ग़ज़लो की चन्द पंक्तियां पेश है
ज़ुबां अलग सही जज़्बात तो एक है ।
हिंदी उर्दू के हालात तो एक है
समर्पण ने सजाया है जो आज यह गुलसिता
बताते है कि हम सब के हालात तो एक है
-मास्टर शहज़ाद
मैं जब से उस की ज़ुलफो की कैद से निकल गया।
यह कह रहे हैं सब मुझसे तू बिल्कुल बदल गया
-सलामत राही
मेरी ख़ामियो को गिनना छोड़ दें
बहतर है मुझ से मिलना छोड़ दें
यह दुनिया हमें ज़ख्मों के सिवा क्या देगी
मरहम लगाना ज़ख्म सिलना छोड़ दें
– राम कुमार भोकर हेड़ी
कभी क्या पता कि ठोकर ही बदल के रख दें किस्मत
मेरे रास्ते के पत्थर मेरे रास्ते में रहना
-अल्ताफ मशअल
चांद को बादलों ने घेरा है
इस लिए आज कुछ अंधेरा है
-डाक्टर वीना गर्गयह तो मुश्किल है तेरा हिज़्र गवारा कर लूं
इस से बेहतर तो मैं दुनिया से किनारा कर लू
और कुछ देर मेरे सामने बैठे रहिए
और कुछ देर मैं दीदार तुम्हारा कर लूं
– शमीम, किरतपुरी
वो उड़े तो इतना उड़े हवाएं ख़त्म हो गईं
आकाश के शून्य में कहीं आ फंस के मर
लि ली, लि ली,लि ली ओर
-चौधरी सोम एडवोकेट
अपनी ताकत पे तकब्बुर है सितमगर को क्यों
पानी मिट्टी से सभी को तो बनाया उस ने
-अहमद मुज़फ्फरनगर
पासबां उस को कहूं या उस को मैं ग़ाफ़िल कहूं
कौम की राहों में कांटे बो रहा है आदमी
– कलीम त्यागी
तू अपने होटों पर कलम रखा कर
ज़िन्दगी के रूख़ को नरम रखा कर
अज़मतें मुझ पे फ़क़ीरों की हुई हैं रोशन
इस लिए छोड़ के शाहों को ग़ुलाम आया है
-अब्दुल हक़ सहर
सुना है ज़ख्म दे कर लोग फिर मरहम लगाते हैं
जहां पर ज़ख्म गहरे हों वहां पर कम लगाते है।
“सिकन्दर देवरिया वी
साहित्य की गंगा बहे यमुना बहे प्रेम की
आपसी सौहार्द हो मैत्री बढ़े प्रेम की
-वीर सिंह बिजनौर
जब ज़िन्दगी को हार के आना था क़ब्र में
आबे- हयात ढ़ूंढने जाते कहां कहां
– जुनैद अज़हर
गोष्ठी में आए सभी कवियों एवं शायरों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया बिजनौर से आए गीतकार ओमवीर सिंह एवं शमीम किरतपुरी को मुख्य अतिथि के रूप में सम्मान पत्र और शाल पेश कर सम्मानित किया गया।
अन्त में तहसीन समर और समर्पण के अध्यक्ष ईश्वर दयाल गुप्ता ने सभी कवियों शायरों उपस्थित जनों का आभार जताया
रिपोर्टर — महताब आज़ाद




