प्रिय पावस – डॉ क्षमा कौशिक

प्रिय पावस ऋतु तेरा आना।
मन में नव आशा भर जाना।।
हलधर की प्यासी नजरों को,
सजल हर्ष-जल से कर जाना।
सूखे ताल-तलैया पोखर,
को निज अमृत से भर जाना।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना…..
विविध वर्ण फल पुष्प लता से,
वन उपवन का रूप सजाना।।
तृण कोपल तरु अरु पल्लव से।
धरती का श्रृंगार लगाना।।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना…
इंद्रधनुष के रंगों में रँग,
मन का सतरंगी हो जाना।
रिमझिम बूँदों के चुंबन से,
रोम-रोम पुलकित कर जाना।।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना…….
पपीहे का मृदु तान सुनाना,
कुहुक-कुहुक कोयल का गाना।।
सारंगी का हर्षित होकर,
पंख पसारे नृत्य दिखाना।।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना…
लगे सुहाना संग पिया का
मन भाये मनुहार मनाना।।
घन-गर्जन अरु जल-वर्षण से
भीत जान निज अंग लगाना।।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना….
सुनकर कूक पिकी विरहा की।
उसकी पीड़ा में घुल जाना।।
सुख की यादें शूल सरिस चुभ,
पीर विरह की और बढ़ाना।।
प्रिय पावस ऋतु तेरा आना….
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून




