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प्रेयसी – रश्मि मृदुलिका

स्वेत स्वप्निल नयनों में,
मेघों की काजल रेखा से,
मद्धिम स्मित मुख पर अलंकृत किए,
अनुराग की लज्जा ओढ़े,
प्रिय हेतु, सस्मित बदन लिए,
ढ़लती सांझ की अरूणिमा जैसे,
धीरे- धीरे चली आ रही प्रेयसी रात्रि,
नुपूर झींगुर की छनकती जाती,
चमक उठते हैं भाव अनगिनत,
वारूणी के चंचल किरणों जैसे,
पाखी बन उड़ चले मन के पाती,
पढ़ रहा जिन्हें व्याकुल व्योम वासी,
-रश्मि मृदुलिका, देहरादून, उत्तराखण्ड




