उत्तराखण्ड

श्रद्धालुओं की जान इतनी सस्ती क्यों?- डॉ. प्रियंका सौरभ

चारधाम हेलीकॉप्टर हादसों पर जांच नहीं, जवाबदेही भी तय ह

utkarshexpress.com – 17 साल, 15 हेलीकॉप्टर हादसे और 46 मौतें। ये आंकड़े केवल दुर्घटनाओं का सरकारी रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज हैं जिन्होंने धार्मिक आस्था और चारधाम यात्रा के सपने के साथ अपने प्रियजनों को खो दिया। व्यक्तिगत तौर पर ये आंकड़े मुझे विचलित करते हैं। मन में बार-बार एक ही सवाल उठता है कि आखिर चारधाम हवाई यात्रा में श्रद्धालुओं की जान की कीमत इतनी सस्ती क्यों होती जा रही है? एक के बाद एक हेलीकॉप्टर हादसे होते हैं, जांच के आदेश दिए जाते हैं, कुछ समय तक चर्चा होती है और फिर व्यवस्था पहले की तरह चलने लगती है। सवाल यह है कि इन दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार संस्थागत तंत्र की जवाबदेही आखिर कब तय होगी? चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था, पर्यटन और रोजगार से भी जुड़ी है। हर साल लाखों श्रद्धालु बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इनमें बुजुर्ग, महिलाएं और ऐसे लोग भी होते हैं जिनके लिए कठिन पहाड़ी रास्तों से यात्रा करना संभव नहीं होता। हेलीकॉप्टर सेवा उनके लिए सुविधा और राहत का माध्यम बनती है। लेकिन जब यही सुविधा लगातार दुर्घटनाओं की आशंका से घिरने लगे तो सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आस्था के नाम पर श्रद्धालुओं की जान को जोखिम में नहीं डाला जा सकता।

इन हादसों में खराब मौसम, अचानक घने बादलों का छा जाना, कम दृश्यता और तकनीकी खामियां प्रमुख कारणों के रूप में सामने आते रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम का मिजाज कुछ ही मिनटों में बदल सकता है। घाटियों में बादलों का जमाव, तेज हवाएं और सीमित दृश्यता पायलटों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी करती हैं। ऐसे में सामान्य मौसम पूर्वानुमान के आधार पर उड़ान की अनुमति देना पर्याप्त नहीं हो सकता। इसके लिए स्थानीय मौसम की वास्तविक स्थिति, तकनीकी आकलन और विमानन सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों की राय आवश्यक है। यहीं उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूकाडा) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हेलीकॉप्टर संचालन की निगरानी, उड़ानों के नियमन और संबंधित प्रशासनिक समन्वय में उसकी जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब खराब मौसम के कारण उड़ानें रोकने या दोबारा शुरू करने का निर्णय लिया जाता है तो उस निर्णय का तकनीकी आधार क्या होता है? क्या यूकाडा के पास मौसम की जटिल परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ और संसाधन हैं? क्या उड़ान संचालन से पहले मौसम संबंधी सूचनाओं का स्वतंत्र सत्यापन किया जाता है? यदि नहीं, तो इतने संवेदनशील हवाई मार्ग पर सुरक्षा का निर्धारण किस आधार पर हो रहा है?

हाल ही में बदरीनाथ में हुई हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने इन सवालों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। दुर्घटना वाले दिन सुबह यूकाडा की अनुमति से हेलीकॉप्टर उड़ानों को रोक दिया गया था, लेकिन कुछ समय बाद संचालन फिर शुरू कर दिया गया। यह जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बदलीं जिनके आधार पर उड़ानों को दोबारा अनुमति दी गई? विशेष रूप से तब, जब मौसम को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी होने की बात सामने आई थी। क्या मौसम का दोबारा तकनीकी परीक्षण किया गया था? क्या किसी सक्षम विशेषज्ञ ने उड़ान के लिए परिस्थितियों को सुरक्षित बताया था? क्या पायलटों को अद्यतन मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई गई थी? यदि हां, तो संबंधित रिपोर्ट और निर्णय प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए? यहां एक बात समझना जरूरी है कि उड़ान रोकना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा निर्णय है। इसी तरह उड़ान दोबारा शुरू करना भी उतना ही गंभीर फैसला है। यदि किसी अधिकारी या संस्था के निर्णय के आधार पर हेलीकॉप्टर संचालन शुरू होता है और उसके बाद दुर्घटना घटती है तो उस निर्णय की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक दुर्घटना के लिए प्राधिकरण को पहले से दोषी मान लिया जाए, बल्कि यह है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया, उपलब्ध सूचनाओं और सुरक्षा मानकों के पालन की जांच अनिवार्य हो।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बदरीनाथ दुर्घटना की जांच के आदेश दिए हैं। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन जांच केवल दुर्घटना के तात्कालिक कारणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें पिछले 17 वर्षों के हादसों का भी तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि कितनी दुर्घटनाएं खराब मौसम, तकनीकी खराबी, मानवीय चूक अथवा संचालन संबंधी कमियों के कारण हुईं। क्या पहले की जांचों में सुझाए गए सुधार लागू किए गए? क्या हेलीकॉप्टर कंपनियों के सुरक्षा रिकॉर्ड की नियमित समीक्षा हुई? क्या पायलटों को पहाड़ी क्षेत्रों में उड़ान संचालन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और मौसम संबंधी अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराई गई? इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उड़ानों की अनुमति देने और रोकने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी तथा विशेषज्ञ आधारित मानक व्यवस्था हो। मौसम संबंधी चेतावनी जारी होने पर उड़ानों के संचालन का निर्णय किस स्तर पर लिया जाएगा, इसके नियम सार्वजनिक होने चाहिए। प्रत्येक निर्णय का लिखित रिकॉर्ड रखा जाए। उड़ान शुरू करने से पहले मौसम की स्थिति का तकनीकी सत्यापन हो और किसी भी स्तर पर संदेह की स्थिति में सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। यात्रियों को भी मौसम और संभावित जोखिमों की वास्तविक जानकारी मिलनी चाहिए।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतने हादसों के बाद भी संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न प्रभावी ढंग से सामने नहीं आ पाया है। हर दुर्घटना के बाद कुछ समय तक जांच और कार्रवाई की चर्चा होती है, लेकिन व्यवस्था में स्थायी सुधार की तस्वीर स्पष्ट नहीं दिखाई देती। यदि किसी मामले में निर्धारित सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई है तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। केवल पायलट या हेलीकॉप्टर कंपनी तक जांच सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। अनुमति, निगरानी, मौसम संबंधी निर्णय और प्रशासनिक नियंत्रण की पूरी श्रृंखला की पड़ताल जरूरी है। चारधाम यात्रा में श्रद्धालु सरकार और प्रशासन पर भरोसा करके आते हैं। यह भरोसा केवल सुविधाएं उपलब्ध कराने से नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने से कायम रहता है। पर्यटन और धार्मिक आस्था के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। हेलीकॉप्टर सेवा सुविधा है, अनिवार्यता नहीं। मौसम प्रतिकूल हो तो उड़ान रोकना यात्रियों को असुविधा में डाल सकता है, लेकिन किसी संभावित दुर्घटना से बचाने के लिए यही सबसे जिम्मेदार निर्णय हो सकता है।

अब समय केवल हादसों पर दुख जताने और जांच के आदेश देने का नहीं, बल्कि उन कारणों को समाप्त करने का है जिनसे ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है। 17 वर्षों में 15 हादसे और 46 मौतें व्यवस्था से जवाब मांग रही हैं। सरकार को इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देना होगा कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है और लापरवाही सामने आने पर जवाबदेही किसकी तय होगी? आखिर आस्था के इस कठिन सफर में श्रद्धालुओं की जान की कीमत इतनी सस्ती क्यों हो? सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए, क्योंकि किसी भी धार्मिक यात्रा की सफलता दर्शन से पहले सुरक्षित घर वापसी में निहित है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button