बच्चों का डिजिटल बचपन बचाने की एक सार्थक पहल – पवन वर्मा

utkarshexpress.com – पत्रकारिता के दौरान आईपीएस अफसर डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव को अनेक अवसरों पर उन्हें नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला। करीब 25 वर्षो के लंबे समय में मैंने उनके व्यक्तित्व की एक विशेषता हमेशा देखी है। वे जिस भी काम को हाथ में लेते हैं, उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करते हैं। पुलिस सेवा के दौरान भी उनकी सोच केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रही। आमजन की बेहतरी के लिए कुछ सार्थक करने की ललक उनके भीतर हमेशा दिखाई देती थी। अपराधों के प्रति लोगों को जागरूक करना, समाज को सतर्क बनाना और संभावित खतरों के बारे में पहले से चेताना उनके स्वभाव का हिस्सा रहा है।
पुलिस की नौकरी में अधिकांश अधिकारी अपराध होने के बाद कार्रवाई करते हैं, लेकिन डॉ. श्रीवास्तव पुलिस अधीक्षक से लेकर पुलिस महानिदेशक रहने तक हमेशा अपराध की रोकथाम के लिए जन-जागरूकता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते रहे। यही कारण है कि सेवा के दौरान वे लगातार लोगों को जागरूक करने के प्रयास करते रहे। सेवानिवृत्ति के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं। आज भी वे लेखन, व्याख्यानों और संवाद के माध्यम से समाज को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। बच्चों की डिजिटल सुरक्षा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर लिखी गई उनकी नई पुस्तक “Innocence at Risk: Protecting Children in the Age of Algorithms” उसी सामाजिक सरोकार और जागरूकता अभियान का विस्तार प्रतीत होती है।
यह पुस्तक ऐसे समय में सामने आई है जब बच्चों का बचपन तेजी से बदल रहा है। कुछ दशक पहले तक बच्चे स्कूल, खेल के मैदान, किताबों और परिवार के बीच अपना संसार बनाते थे। आज उनका एक बड़ा संसार मोबाइल फोन की स्क्रीन के भीतर बसता है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम्स, वीडियो प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकें उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। यह दुनिया अवसरों से भरी हुई है, लेकिन इसके साथ ऐसे खतरे भी मौजूद हैं जिनकी गंभीरता को अक्सर अभिभावक और बच्चे पूरी तरह समझ नहीं पाते। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
यह पुस्तक डिजिटल दुनिया के उन्हीं अनदेखे और अक्सर अचर्चित खतरों को सामने लाती है। साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन, डीपफेक, डिजिटल ब्लैकमेलिंग, फर्जी पहचान, डेटा चोरी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग और डार्क वेब जैसे विषयों को इसमें विस्तार से समझाया गया है। लेखक केवल यह नहीं बताते कि खतरे क्या हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि वे काम कैसे करते हैं, बच्चे उनके जाल में कैसे फंसते हैं और उनसे बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं।
पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका संतुलित दृष्टिकोण है। डिजिटल तकनीक को इसमें खलनायक की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया है। लेखक स्वीकार करते हैं कि इंटरनेट और तकनीक ने ज्ञान, संवाद और अवसरों की नई दुनिया खोली है। लेकिन साथ ही वे यह भी बताते हैं कि बिना जागरूकता और सुरक्षा उपायों के यही तकनीक बच्चों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यही संतुलन पुस्तक को विश्वसनीय बनाता है।
इस पुस्तक का लेखन भी उल्लेखनीय है। पिता, पुत्री की जोड़ी ने मिलकर इसका लेखन किया। युवा अधिवक्ता ऐश्वर्या श्रीवास्तव और पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव का संयुक्त प्रयास इसे विशेष बनाता है। एक ओर नई पीढ़ी की डिजिटल समझ और कानूनी दृष्टि है, तो दूसरी ओर दशकों का प्रशासनिक और पुलिस अनुभव। दो पीढ़ियों के अनुभव और दृष्टिकोण के इस यह संगम ने पुस्तक को गहराई प्रदान की है।
यह पुस्तक केवल खतरों की पहचान तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह समाधान भी प्रस्तुत करती है। यदि कोई बच्चा डिजिटल अपराध का शिकार हो जाए, तो उसके बाद क्या किया जाना चाहिए, इस पर विस्तार से चर्चा की गई है। डिजिटल पहचान की मरम्मत, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल, कानूनी प्रक्रिया, साक्ष्य संरक्षण, सामाजिक पुनर्वास और परिवार की भूमिका जैसे विषयों को बहुत गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है।
आमतौर पर साइबर सुरक्षा पर लिखी गई पुस्तकों में तकनीकी पहलुओं पर अधिक जोर होता है, लेकिन यह पुस्तक मानवीय पक्ष को भी उतना ही महत्व देती है। लेखक यह समझते हैं कि किसी बच्चे की निजी तस्वीरों का दुरुपयोग, ऑनलाइन अपमान या साइबर शोषण केवल तकनीकी घटना नहीं होती। इसका असर बच्चे के आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंधों और भविष्य पर भी पड़ता है। यही संवेदनशीलता इस पुस्तक को अलग पहचान देती है।
पुस्तक में बच्चों, अभिभावकों, शिक्षकों, विद्यालयों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और तकनीकी कंपनियों के लिए अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। यह इसे केवल एक अध्ययन पुस्तक नहीं रहने देती, बल्कि एक व्यवहारिक मार्गदर्शिका बना देती है। कोई अभिभावक अपने बच्चे की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंतित हो, कोई शिक्षक विद्यार्थियों को डिजिटल नागरिकता सिखाना चाहता हो या कोई नीति-निर्माता इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहता हो, सभी के लिए इस पुस्तक में उपयोगी सामग्री मौजूद है।
मुझे इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह लगा कि डिजिटल सुरक्षा अब विकल्प नहीं,आवश्यकता है। जिस प्रकार सड़क पर चलने से पहले बच्चों को ट्रैफिक नियम सिखाए जाते हैं, उसी प्रकार इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश करने से पहले उन्हें डिजिटल सुरक्षा के नियम भी सिखाए जाने चाहिए। दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी तक इस दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठा पाई है।
मेरी दृष्टि में यह पुस्तक केवल अभिभावकों और शिक्षकों के लिए ही नहीं, बल्कि बच्चों के लिए भी आवश्यक है। आज का बच्चा डिजिटल दुनिया का सक्रिय हिस्सा है। वह सोशल मीडिया का उपयोग करता है, ऑनलाइन गेम खेलता है, इंटरनेट से जानकारी प्राप्त करता है और अनेक डिजिटल मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इसलिए यह जरूरी है कि वह इस दुनिया के अवसरों और खतरों दोनों को समझे। यह पुस्तक बच्चों को डराती नहीं, बल्कि उन्हें सजग और जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।
मेरा मानना है कि सरकार को भी इस दिशा में गंभीर पहल करनी चाहिए। जिस प्रकार सड़क सुरक्षा, पर्यावरण और स्वास्थ्य शिक्षा को विद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, उसी प्रकार डिजिटल सुरक्षा और डिजिटल नागरिकता को भी शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। इस पुस्तक जैसी सामग्री स्कूलों और महाविद्यालयों की लाइब्रेरियों में उपलब्ध होनी चाहिए। यदि संभव हो तो इसके प्रमुख विषयों को विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य अध्ययन सामग्री के रूप में भी शामिल किया जाना चाहिए।
आज जब बच्चों का बचपन तेजी से स्क्रीन, एल्गोरिद्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित दुनिया के बीच आकार ले रहा है, तब “Innocence at Risk: Protecting Children in the Age of Algorithms” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि समय की मांग है। यह हमें याद दिलाती है कि तकनीकी प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी है, जब वह बच्चों की सुरक्षा, गरिमा और भविष्य के साथ संतुलित हो।
डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने अपने लंबे पुलिस सेवा काल में समाज को अपराधों के प्रति जागरूक करने का काम किया। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे उसी मिशन पर सक्रिय हैं। यह पुस्तक उसी यात्रा का नया अध्याय है। मुझे विश्वास है कि यह कृति न केवल अभिभावकों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को सोचने पर मजबूर करेगी, बल्कि बच्चों को भी एक सुरक्षित और जिम्मेदार डिजिटल भविष्य के लिए मार्गदर्शन देगी। (विनायक फीचर्स)




