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मिथिला के स्वर में रची-बसी सोनी चौधरी – कुमार कृष्णन 

utkarshexpress.com मिथिला – मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उन सांस्कृतिक धरतियों में से एक है, जहाँ लोकजीवन, साहित्य, संगीत और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक बनकर विकसित हुए हैं। यही वह भूमि है जहाँ राजा जनक की विदेह परंपरा ने ज्ञान को प्रतिष्ठा दी, जहाँ माता सीता के जीवन ने त्याग, करुणा और शक्ति का आदर्श स्थापित किया। जनकपुर धाम और मिथिला के गाँव आज भी लोकआस्था की जीवित स्मृतियों को सँजोए हुए हैं। महाकवि विद्यापति की पदावली से लेकर विवाह गीतों, सोहर, समदाउन, भगैत और देवी-गीतों तक मिथिला का लोकसंगीत आज भी जीवन के हर संस्कार में धड़कता है। इस सांस्कृतिक परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने वाले कलाकारों में कवयित्री एवं लोकगायिका सोनी चौधरी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
सोनी चौधरी की पहचान केवल एक लोकगायिका की नहीं है। वे कवयित्री हैं, गीतकार हैं और ऐसी साधिका हैं, जिन्होंने लोकगीत, भजन, ग़ज़ल, ठुमरी और भावगीत को समान आत्मीयता के साथ स्वर दिया है। उनकी गायकी में मंचीय प्रदर्शन की चकाचौंध से अधिक साधना की गंभीरता दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके स्वर में मिथिला की माटी की सोंधी गंध, लोकजीवन की सहजता और भक्ति की निर्मल धारा एक साथ प्रवाहित होती है।
किसी कलाकार की पहचान केवल उसके गाए हुए गीतों से नहीं होती, बल्कि उसके भीतर बसे संवेदनशील रचनाकार से भी होती है। सोनी चौधरी की कविताएँ और गीत इस बात का प्रमाण हैं कि वे समाज, प्रकृति और मानवीय संबंधों को गहरी दृष्टि से देखती हैं। उनकी पंक्तियाँ “तकिते रहलहुँ कौआ सभदिन, कान अपन नहि देखलहुँ, ताड़ैत रहलहुँ अवगुण सबहक, टिटही बनि नभ टेकलहुँ…” मनुष्य की उस प्रवृत्ति पर तीखा किंतु मार्मिक व्यंग्य करती हैं, जिसमें वह दूसरों की कमियाँ तो खोजता रहता है, पर स्वयं के भीतर झाँकने का साहस नहीं जुटा पाता। लोकभाषा में कही गई यह बात गहरी सामाजिक चेतना का परिचय देती है।
इसी प्रकार उनकी रचना “मिथिलेमे गंगा काशी…” मिथिला की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महिमा का सुंदर गान है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि उस लोकविश्वास की अभिव्यक्ति है जिसमें मिथिला की धरती को ज्ञान, श्रद्धा और संस्कृति का केंद्र माना गया है। वहीं उनकी मार्मिक पंक्ति “चांधन बूझि हम रोपल सजनी…” जीवन की संवेदनाओं, विश्वास और मानवीय रिश्तों की कोमल अनुभूतियों को स्वर देती है।
सोनी चौधरी की गायकी का एक विशिष्ट पक्ष उनका भक्ति-संगीत है। जब वे “दर्शनक पियासल हमर नयन…” जैसी प्रस्तुति गाती हैं, तो श्रोताओं के लिए वह केवल संगीत नहीं रह जाता, बल्कि भक्ति और आत्मसमर्पण का अनुभव बन जाता है। इसी तरह दूरदर्शन बिहार से प्रसारित उनकी रचना “पुष्प की मंजरी” – “तुम भ्रमर मैं बनूं पुष्प की मंजरी, तुम अधर मैं बनूं प्रीत की बाँसुरी…” – उनके भीतर की कवयित्री और संगीतकार दोनों का परिचय देती है। प्रेम, सौंदर्य और संवेदना का ऐसा संतुलन उनकी रचनात्मक पहचान को और अधिक विशिष्ट बनाता है।
आज जब लोकसंगीत तेजी से बाज़ारवाद और तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में अपना मूल स्वर खोता जा रहा है, ऐसे समय में सोनी चौधरी की साधना यह विश्वास जगाती है कि लोकधुनों की आत्मा अब भी जीवित है। उन्होंने मिथिला के पारंपरिक संगीत को केवल संरक्षित ही नहीं किया, बल्कि उसे अपने स्वर, अपनी कविता और अपनी संवेदना के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सतत प्रयास किया है।
मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा में स्त्री-स्वर का विशेष महत्व रहा है। यहाँ लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कार, श्रम, विरह, भक्ति और उत्सव की सामूहिक अभिव्यक्ति रहे हैं। इसी परंपरा को समकालीन समय में नई ऊर्जा देने वाली कलाकारों में सोनी चौधरी का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने स्वर से यह सिद्ध किया है कि लोकसंगीत केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धड़कन भी है।
उनकी कविताओं और गीतों में भाषा की सरलता के भीतर गहरी अर्थवत्ता छिपी रहती है। वे लोकभाषा की उस शक्ति को पहचानती हैं, जो सीधे हृदय तक पहुँचती है। मैथिली, हिंदी और लोकबोली के सहज मिश्रण से वे ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करती हैं, जिनमें गाँव की मिट्टी की गंध, स्त्री-मन की कोमलता, सामाजिक यथार्थ की पीड़ा और आध्यात्मिक आकांक्षा सब एक साथ उपस्थित रहते हैं।
किसी भी कलाकार की वास्तविक पहचान पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उसकी साधना और समाज पर उसके प्रभाव से होती है। सोनी चौधरी के साथ भी यही हुआ है। लोकसंगीत, कविता और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें हाल ही में राष्ट्रीय युवा कल्याण परिषद, पटना द्वारा ‘बिहार रत्न सम्मान’ से अलंकृत किया गया। संस्था के अध्यक्ष विश्वमोहन चौधरी ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि मैथिली लोकसंस्कृति की प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है।
इससे पहले भी उन्हें ‘संगीत रत्न सम्मान-2022’, ‘सुर मधुकर सम्मान’, ‘तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान’, ‘स्वामी विवेकानंद युवा सम्मान’, ‘बिहार सम्मान’ तथा ‘संत शिरोमणि लक्ष्मीनाथ गोसाई सम्मान’ सहित अनेक अलंकरण प्राप्त हो चुके हैं।
दरभंगा के शुभंकरपुर में जन्मी सोनी चौधरी साहित्यिक वातावरण में पली-बढ़ीं। वे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. रमाकांत झा की पुत्री हैं तथा बेनीपुर प्रखंड के नेहरा गाँव के गौड़ीशंकर चौधरी परिवार की पुत्रवधू हैं। परिवार से मिले साहित्यिक संस्कार और अपनी निरंतर साधना ने उन्हें उस मुकाम तक पहुँचाया, जहाँ वे एक साथ कवयित्री, गीतकार और लोकगायिका के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
वैश्वीकरण और डिजिटल संस्कृति के दौर में अनेक लोकभाषाएँ और लोकधुनें अपने अस्तित्व की चुनौती से जूझ रही हैं। ऐसे समय में सोनी चौधरी जैसे कलाकार केवल गीत नहीं गाते, बल्कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी लोकस्मृतियों की रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य भी करते हैं।
मिथिला की धरती ने विद्यापति जैसे महाकवि दिए, जनक और जानकी की परंपरा दी। इसी समृद्ध परंपरा की समकालीन प्रतिनिधि के रूप में सोनी चौधरी का योगदान विशेष महत्व रखता है। उन्होंने अपनी कला से यह सिद्ध किया है कि लोकसंगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत शक्ति है।
जब भी उनके स्वर में मिथिला की बोली गूँजती है, तो केवल एक गीत नहीं सुनाई देता, बल्कि पूरी सांस्कृतिक सभ्यता बोल उठती है। सोनी चौधरी की साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है और उनकी गायकी यह विश्वास जगाती है कि जब तक ऐसे स्वर जीवित हैं, तब तक मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा भी पूरी गरिमा के साथ जीवित रहेगी। (विभूति फीचर्स)

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