मनोरंजन
सुमन की ज़िन्दगी क्या?- पूनम शर्मा

खहमारी भी तमन्ना है कि अब उपराम पा जाए!
पड़े हैं धूप में छाले कहीं तो शाम आ जाए!!
सुमन की ज़िन्दगी है क्या?
खिला खिलकर बिखर जाना,
कहीं उन्मन दुखद जीवन, नहीं अवगत किधर जाना;
कभी भॅंवरा मचलता गुनगुनाता जाम पा जाए!!
भॅंवर में डोलती नैया हिलौरें ले रही छॅंइया,
किसी आवाज़ में दम था, कहीं पर शोर हो हॅंइया;
थके से पग वहीं कहते रहे सुखधाम पा जाए!!
वरक़ पर हाशिया से अरु कहीं पर प्रश्न-सूचक से,
कहीं विवरण, कहीं पर अवतरण के शुद्ध-बोधक थे ;
यूॅं ही चलते हुए ‘पूनम’,कहीं विश्राम पा जाए!!
– पूनम शर्मा ‘पूर्णिमा’, देहरादून




