मनोरंजन

पलकों की देहरी पै – अनिल भारद्वाज

लय की मरहम मेरे गीतों पै लगाने आजा।

दिल के टूटे हुए टुकड़ों को मिलाने आजा।

 

नींद के घर में तो हर रोज ही तू आता है,

पलकों की देहरी पै पदचिन्ह बनाने आजा।

 

मेरी किस्मत ने तेरा नाम लिखा था जिन पर,

उन लकीरों को इन हाथों से मिटाने आजा,

 

आंखें भर आती है सूखी नदी की चाहे जब,

डगमगाती हुई किश्ती को डुबाने आजा।

 

दर्द की आग ने बुझने न दिया दिल का दिया,

इस सिसकती हुई बाती को बुझाने ने आजा।

 

अपने इन वादों के सूखे गुलाबों को आकर,

मेरी उम्मीदों की अर्थी पै चढ़ाने आ जा।

 

आखिरी बार तेरे कांधे पर सिर रख रोलूं,

बहुत बेबस हूं सिर्फ कांधा लगाने आजा।

-अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर

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