मनोरंजन

चौपाई छंद – मणि अग्रवाल

माँ वाणी की महिमा गाऊँ।
दर पर प्रतिदिन शीश झुकाऊँ।।
सच्चे मन से है अभिनंदन।
स्वीकारो माँ मेरा वंदन।।

श्वेत वसन तन पर हैं शोभित।
कंकण कुण्डल करते मोहित।।
निर्मल निश्छल आनन प्यारा।
आभा करती जग उजियारा।।

ब्रह्मचारिणी मात भवानी।
शुभता तेरी है जगजानी।।
कण्ठ विराजित होतीं माता।
तब प्राणी स्वर का वर पाता।।

मात शारदे! इतना वर दो।
सार्थक मेरा लेखन कर दो।।
ज्ञान बढ़े अज्ञान न ठहरे।
भाव सृजन के भी हों गहरे।।

मन वाणी से शुद्ध रहूँ मैं।
एक न अनुचित बात कहूँ मैं।।
सबका मङ्गल चाहूँ मन से।
दुर्गुण दूर रहें जीवन से।।
– मणि अग्रवाल “मणिका”,
माज़रा, देहरादून (उत्तराखंड)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button