मनोरंजन

पिता – सविता सिंह

पिता को लिखूँ, इतना सामर्थ्य कहाँ!”

मेरी सामर्थ्य कहाँ,

जो मैं पिता को शब्दों में बाँधूँ,

जिन्होंने स्वयं मुझे गढ़ा है,

उनका मोल मैं कैसे आँकू?

वह कभी थक हार कर टूटी आँखों की

गहरी निंदिया बन जाते हैं,

तो कभी जेठ की तपती दुपहरी में

शीतल छैयां बन जाते हैं।

कभी वह असीम हौसलों को

भरने को पूरा आकाश बन जाते हैं,

तो कभी बुझते हुए प्राणों को थामने

जीवन की वायु बन जाते हैं।

वह क्या हैं… यह कह पाना भला

इस रसना के वश में कहाँ?

जब मेरा रोम-रोम उन्हीं का है,

तो मैं निःशब्द रह कर ही शीश झुकाऊँ।

मेरे भीतर अगर तनिक भी

भलाई और अच्छाई की परछाई है,

तो सच कहूँ, वो मेरे पिता की ही

जीवन भर की अनमोल कमाई है।

माँ भी सदा मुस्कुराकर हमसे

यही बात कहती रहती है,

उन्होंने अपनी सरल साधना में

बस यही एक पूँजी पाई है।

आज संसार जब हमें अपने

चौखट पर आदर से बुलाता है,

“फलां साहब की लाडली बेटी है

ये” कह कर लाड जताता है,

तब सबके मुख पर गौरव की

एक सुंदर लकीर उभर आती है,

और उनका  मौन आशीष,

शीतल छाँव बन मेरे शीश पर

ठहर जाता है।

मेरा स्वयं का कोई अस्तित्व नहीं,

मैं तो बस उनका एक प्रतिरूप हूँ,

भीतर मेरे पिता ही बसते हैं,

तभी तो मैं आज इस मान के अनुरूप हूँ।

-सविता सिंह मीरा . जमशेदपुर

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