मनोरंजन

ग़ज़ल – कशिश

 

यह  तमन्नाओं का गुलज़ार  बहुत  अच्छा  है,

मौसम-ए-हिज्र  तो  इस  बार  बहुत  अच्छा है।

 

ज़िन्दगी आई थी कुछ ख़्वाब सी शर्तें  ले कर,

आप ने  कर  दिया  इनकार बहुत अच्छा  है।

 

पहले  दो  चार ज़माने  में  हुआ  करते  थे,

अब तो  हर शख़्स अदाकार बहुत अच्छा  है।

 

हम  परेशाँ  हैं  मगर  हाल  कोई  पूछे  तो,

यूँ ही कह  देते  हैं हर बार बहुत अच्छा है।

 

दर्द के पहलू में वो छोड़  गये  थे  जिस को,

उन से कहना कि वो बीमार बहुत अच्छा  है।

 

सच कोई  सुनने को  तैय्यार कहाँ  होता  है

आप ने  छोड़  दी  तकरार बहुत अच्छा  है।

 

उस के लहजे में ज़रा तल्ख़ी है माना लेकिन,

वैसे उस शख़्स का किरदार बहुत अच्छा  है।

 

रू-ब-रू  देखेंगे  तो  आप  को  हैरत  होगी,

जो  तमाशा पस -ए- दीवार बहुत अच्छा  है।

 

अब वो  कैसा है अगर क़ैस कभी पूछे  तो,

कहना वो नज्द का  बाज़ार बहुत अच्छा है।

 

आप कहते हैं कि दुनिया यह बुरी है लेकिन,

इस में भी एक  मिरा यार बहुत अच्छा  है।

 

वक़्त से जीता नहीं कोई भी दुनिया में “कशिश”,

आप  ने मान  ली ख़ुद हार बहुत अच्छा  है।

– कशिश होशियारपुरी, शिकागो, अमेरिका

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