याद तेरी आती है – नीलांजना गुप्ता

अधर रहते मौन लेकिन नज़र कुछ कह जाती है
तू चला जाता है लेकिन याद तेरी आती है
देखती हूँ उन निगाहों में क़ि इक जंगल घना है
देखती हूँ दूर तक कुहरे का इक तम्बू तना है
मैं भटकती फिर रही हूँ प्यार के उन जंगलों में
आशियाना ढूँढती हूँ कोहरे के उन तम्बुओं में
फिर ठहर कर सोचती क्यों चाह यह भटकाती है
तू चला जाता है लेकिन याद तेरी आती हैं
उन निगाहों में दिखे हैं प्रेम के ऊँचे शिवाले
धरा पर छिटके हैं तारे झिलमिलाते व्योम वाले
उन शिवालों में प्रणय का दीप बनकर जल रही हूँ
रख सितारों पर कदम मैं स्वर्ग पाने चल पड़ी हूँ
स्वप्न है या जागरण तन्द्रा मुझे समझाती है
तू चला जाता है लेकिन याद तेरी आती है
उन निग़ाहों में दिखा है प्यार का सागर उमड़ता
भावना का ज्वार भाटा हृदय में रह रह घुमड़ता
औ कभी महसूस की हैं बर्फ सी ठंडी हवाएं
कभी रिमझिम की झड़ी कभी ग्रीषम की ज्वालाएं
इन बदलते मौसमों में साँस सी थम जाती है
तू चला जाता है लेकिन याद तेरी आती है
‘बाल्य’ सा चाञ्चळय देखा रूठना औ मचल जाना
चाँद पाने का सा हठ छाया निगाहों में सुहाना
औ कभी देखी हैं पावन गङ्ग लहरों की कलाएं
वासनाओं के किनारे कभी जिनको छू न पाएं
डगमगाती कश्ती को सहारा फिर दे जाती है
तू चला जाता है लेकिन याद तेरी आती हैं
– नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश




