राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ – सविता सिंह

प्रातःकालीन देव दिवाकर,
भासित करते जो भू-अम्बर,
ओज-तेज के राष्ट्रकवि वो,
कहलाए जग में ‘दिनकर’।
अनुपम कृति ‘रेणुका’ रची जो,
गौरव-गाथा गाती है,
सामयिक नीरसता की वेदना,
जन-मानस तक लाती है।
वर्तमान की विकल दशा पर,
जब आक्रोश उमड़ आया,
रच डाली ‘हुंकार’ प्रलय की,
मन का संशय मिटाया।
‘रसवंती’ में रस का सागर,
अनुपम सौंदर्य-समर्पण है,
शब्द-शब्द में रूप झलकता,
काव्य नहीं यह दर्पण है।
‘सामधेनी’ से जागृत की थी,
सोई सामाजिक चेतना,
देश-प्रेम की प्रखर लौ जली,
सुलग उठी वैश्विक वेदना।
‘कुरुक्षेत्र’ है महाग्रंथ,
जो सब रचनाओं पर भारी है,
महाभारत के महाकथानक की,
इसमें गाथा सारी है।
‘उर्वशी’ की काम-चेतना,
‘रश्मिरथी’ का शौर्य-सफर,
इन बिन काव्य-जगत है सूना,
विचार-भाव का बहता प्रखर।
भाव-पक्ष, प्रगतिवाद, छंद, रस,
अलंकारों का संगम,वर्णन
करने बैठूँ उनका, तो पड़ जाते
शब्द भी कम।
धन्य बिहार की पावन माटी,
जहाँ जन्म लिया ‘दिनकर’,
सिमरिया ग्राम हुआ दीप्यमान,
उदित हुए जैसे ‘भास्कर’।
((राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ जन्मदिन विशेष)
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर




