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साँसें तुमको ढूँढ रही – सविता सिंह

तुम आ जाओ तो निखरूँ मैं!
तुम बिन जैसे थमा हुआ है,
धड़कन का हर एक स्पंदन,
तुम बिन सूना पड़ा हुआ है,
इस अंतस का पावन चंदन।
चाहत की सूखी बगिया में,
करो नेह की बौछार सखे!
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे!
मौन खड़ी हूँ इस चौखट पर,
पलकें राह निहार रही ,
जैसे कोई सुरीली धुन,
रह-रह तुम्हें पुकार रही ,
इस व्याकुल मन के सागर में,
अब लाओ तुम ज्वार सखे!
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं…
तुम ही मेरी बंद वंदना,
तुम ही आराधन की भाषा,
तुमसे ही तो महक रही है,
जीवन की ये अभिलाषा,
साँसों के इस कोरे पट पर,
लिख दो तुम बस प्यार सखे!
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं…
जैसे सावन की रिमझिम से,
खिल उठती है सूखी डाली,
वैसे ही तुम संग मिल जाए,
इस जीवन को नई दीवाली,
हृदय-कुंज के बंद झरोखे,
खोल दो तुम इस बार सखे!
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे!
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर




