देश-विदेश

सोशल मीडिया पर ब्लाकिंग का तूफान – विवेकानंद

utkarshexpress.com – इमरजेंसी के दौरान मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। तत्कालीन सरकार चाहती थी कि उसके खिलाफ कोई आलोचनात्मक लेख या खबर न छपे। इसके लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को कमजोर किया गया। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काटी गई। इन कार्रवाइयों के विरोध में उस समय कुछ अखबारों ने अपने संपादकीय पेज खाली छोड़ दिए थे।
आज के हालात क्या उस दौर से अलग हैं? कुछ घटनाओं के आइने में इसका जवाब खोजने की कोशिश कीजिए। पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएं हुईं, जो दिखने में तो सामान्य हैं। इसके पीछे पारदर्शिता और फेक न्यूज पर लगाम जैसे तर्क भी दिए गए हैं, लेकिन इनकी टाइमिंग सरकार के मकसद को संदिग्ध बनाती है।
केंद्र सरकार ने करीब एक महीने पहले टीवी रेटिंग यानि टीआरपी रोक दी है। खबरें हैं कि एक जुलाई को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बार्क यानि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल को निर्देश दिया कि वह टेलीविजन दर्शकों की रेटिंग जारी न करे। दावा किया जा रहा है कि सरकार इस क्षेत्र को साफ-सुथरा, पारदर्शी बनाना चाहती है।
लेकिन क्या यह बात इतनी ही सीधी है जितना समझाने की कोशिश की जा रही है? दरअसल टीवी चैनलों की आमदनी का रास्ता टीआरपी के आंकड़ों से होकर जाता है। विज्ञापनदाता विज्ञापन देने से पहले देखता है कि किस कार्यक्रम की टीआरपी क्या है। रेटिंग रुकने से विज्ञापनदाताओं के सामने असमंजस पैदा होता है कि वह किसे विज्ञापन दें। उनका असमंजस चैनल्स की आमदनी को प्रभावित करता है। यानि टीआरपी ऐसी नस है जिसे दबाने पर मीडिया चैनल्स से लेकर मनोरंजन चैनल्स तक की धमनियों में झुनझुनी पैदा हो सकती है। इन स्थितियों में चैनल्स की मजबूरी हो जाती है कि वे सरकार के संकेतों का आदेश की तरह पालन करें।
अब सवाल है कि सरकार पर संदेह क्यों किया जाए? इसके दो कारण हैं। पहला- टीआरपी रेटिंग रोकने का फैसला ऐसे वक्त में लिया गया जब पेपर लीक मामलों को लेकर देशभर में गुस्से का माहौल था। चौतरफा नीट पेपर लीक होने और दोबारा टेस्ट कराने को लेकर चर्चाएं थीं। हर तरफ सरकार निशाने पर थी। चैनल्स चाहे सरकार समर्थक हों या विरोधी, मजबूरी में उन्हें यह खबर किसी न किसी डिजाइन में दिखानी पड़ रही थी। चूंकि मामला छात्रों से जुड़ा था, छात्र आत्महत्याएं कर रहे थे। इसलिए बहस की कोई भी डिजाइन सवालों की धार मोड़ने में नाकाम साबित हो रही थी। फिर अचानक युवा सड़कों पर उतर आए। इस बीच यह फैसला होने से सरकार की नीयत पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
दूसरा- इस आशंका को तब और बल मिला जब सोशल मीडिया पर ब्लॉकिंग आदेश के आंकड़े बेनकाब हो गए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने पिछले पांच महीनों में औसतन हर 68 सेकंड में एक ब्लॉकिंग आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को दिया। इनकी कुल संख्या 1.95 लाख है। यानी हर दिन 1275 ब्लॉकिंग आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए हैं। यह सब भी मार्च से जुलाई के बीच किया गया। यानि पेपर लीक, सीबीएसई की गड़बड़ियां और जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान।
कुछ वेबसाइट ने एक अधिकारी के हवाले से यह भी दावा किया है कि ब्लॉकिंग ऑर्डर का बड़ा हिस्सा विरोध प्रदर्शनों के दौरान खासकर इंस्टाग्राम पर जारी किया गया था। तीनों प्लेटफॉर्म में से इंस्टाग्राम को पांच महीने में लगभग 1 लाख ब्लॉकिंग आदेश मिले, जो कुल आदेश का लगभग आधा है।
बहरहाल! मीडिया पर लंबे समय से आरोप लग रहे हैं कि वह रिपोर्टिंग के जरिए सरकार की ब्रांडिंग करती है। खासतौर से टीवी मीडिया खबरों और बहसों को इस तरह परोसती है जिससे माहौल सरकार के पक्ष में बने। कुछ टीवी एंकर तो खुल्लमखुल्ला सरकार की वकालत और विपक्ष या सरकार से सवाल पूछने वालों का विरोध करते दिखते हैं। ऐसी कई घटनाएं हैं जिन्हें जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी गई और ऐसी भी कई घटनाएं हैं जो महत्वपूर्ण होते हुए भी विमर्श के केंद्र से बाहर रहीं। अब यह किसी से छिपा भी नहीं रहा और इसका असर भी दिखने लगा है। जंतर-मंतर पर पत्रकारों को छात्रों के गुस्से का सामना करना पड़ा। विपक्षी नेता पहले मीडिया पर बोलने में संकोच करते थे। अब वे भी खुलकर बोलने लगे हैं। कई बार बहस के दौरान स्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि विपक्षी नेता एंकर से ही भिड़ जाते हैं।
सियासत की एक अदा यह भी है कि वह लोगों को और संस्थाओं को कमजोर करती है। फिर कमजोर लोग मिलकर बुरा वक्त लाते हैं। भारतीय समाज, संस्थान कहां खड़े हैं? तथ्य बिखरे पड़े हैं, एक-एक की पड़ताल करते जाइए हकीकत खुलती जाएगी। (विनायक फीचर्स)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button