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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

दर्द अपना सभी से छुपाना पड़ा।
पास होकर हमे दूर जाना पड़ा।
बात मीठी सदा यार हमसे करे,
संग कुर्बत के हमको निभाना पड़ा।
प्यार करते उन्हे दिलो जान से,
राज दिल का नदामत मे छिपाना पड़ा।
है भले आज दुनिया जहानत भरी,
झूठ बोले सभी जग बताना पड़ा।
झेलते हम रहे उनकी शैतानियां,
मन नही था मगर मुस्कुराना पड़ा।
जग मे अब तो दिखे ना शराफत भी *ऋतु,
दूर रह कर हमे खिलखिलाना पड़ा।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़




