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वक़्त का स्पर्श – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

वक़्त ही घाव बनकर आया,

चुपके से दिल को आज़माया,

टूटी साँसों की सरगम में,

दर्द का साया गहराया।

वक़्त ही फिर मरहम बनकर,

आँखों में उजियारा लाया,

सूखी पलकों की धरती पर,

आशा का अंकुर उगाया।

जिसने छीना हर एक सहारा,

वही सहारा बनकर आया,

रात की गहरी चादर में,

सवेरा बन मुस्काया।

वक़्त की ये अजब कहानी,

खुद ही प्रश्न, खुद ही उत्तर,

घाव भी देता है गहरा,

और वही करता है बेहतर।

मत डर इसके बदलते रंगों से,

ये जीवन का सच्चा सार है,

जो आज चुभता शूल बनकर,

कल वही फूलों का हार है।

–  राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम , छत्तीसगढ़

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