मनोरंजन
पूर्णिका – श्याम कुंवर भारती

कितना तुम भागोगे कब तक रुकोगे।
अकेले – अकेले तुम कब तक चलोगे।
खजाना ए दिल खाली कर दिया तुमने।
दिल देके दिल दंड चोरी कब तक भरोगे।
इश्क है तो हुस्न बड़ा अनमोल होता है।
बिना इश्क हुश्न बोझ तुम कब तक सहोगे।
माना कि मल्लिका ए हुस्न हो तुम मगर।
बिना मुझ कद्रदान तन्हा कब तक रहोगे।
वैसे तो सारी किताबें पढ़ लीया है तुमने ।
दिल की किताब भारती कब तक पढ़ोगे।
– श्याम कुंवर भारती, बोकारो, झारखंड




