स्त्री – कंचन श्रीवास्तव

खुशी
खुश होती है
छोटे छोटे अहसासों से
जैसे
जाड़े में
सूखे कड़क कपड़ों से
पति बच्चों की
जरूरतों पर
खरी उतरने से
खुश होती है
उनके लिए
जी कर
जो
उस पर निर्भर हैं
चाहे वो
खाने की थारी लिए बैठे
सास ससुर हो
या रिश्तेदार
तवे से उतरी रोटी
तड़के वाली दाल देने से।
बहुत खुश होती है
अपने हिस्से का
खाना अपने बच्चों और पति को
खिला कर
वो
खुश होती है
इतमिनान से
बैठे
अखबार पढ़ते
पति को देखकर।
महीनों से बचाये
पैसों से फीस भरकर
समय से सबका हिसाब-किताब
करके
वो खुश होती है
भोर में
सबसे पहले
उठके पूजा-पाठ, स्नान ,ध्यान करके
रसोई में दिन भर
व्यस्त रह के
और
देर रात
साफ बिस्तर पर लेट के
वो
खुश होती है
घर का खुशनुमा
माहौल देखके
पर
क्या कोई
समझ पाता है
इसके पीछे के त्याग और समर्पण
की भावना को
पढ़ पाता है उसके मन को
समझ पाता है
कोई दीमाग में
चल रहे उथल पुथल को
नही
जाने कितना नियंत्रित करती है
खुद को
तब जाके
सबके चेहरे
पर खुशी होती है
कभी देखा है
किसी ने
उसके
सिकुड़ी हुई धोती को
टूटी हुई पायल
को
फटे हुए ब्लाउज की बाह को
या
उलझे हुए
बालों को
कभी पढ़ा है
उसकी मनोदशा को
नहीं
क्योंकि
किसी के पास
फुर्सत नही
कि
एक स्त्री के भावों को
पढ़े
उसकी मनोंदशा को समझे
उसके
थके हारे शरीर को देखे
नही
सबको
मतलब है
अपनी जरूरतों से।
पूरी होते ही
आगे बढ़ जाते है
अरे
स्त्री
घर की वो
धूरी है
गर ये ना घूमे
तो
सब ठप हो जाये
फिर
एक स्त्री का महत्व
समझ में
क्यों नही आता
काश!
कि कोई समझ
पाता
तो
उसका चेहरे भी
खिल जाता।
और ये खिलना बेशक
उसके चेहरे पर
होगा
पर खुशियां आपकी
दुगनी होती।
क्योंकि
बुझे मन से
एक स्त्री
कब तक घर को
चलायेगी
एक दिन तो
निढाल
हो ही जाये गी।
इसलिए
घर की
स्त्री का खुश रखिये
आपके घर खुशियां
अपने आप चल कर
आयेंगी।
कंचन श्रीवास्तव आरज़ू प्रयागराज




