मनोरंजन

मन क्यूँ बहका  –  सविता सिंह

ना जाने मन क्यों हर्षाया,

किसने है ये राग सुनाया,

विकल आहत इस तन मन पर

फिर वही बसंत है छाया,

चुप ना रह मेरे मन कह ना

किसने है यह राग सुनाया।

मेरे पथ को आलोकित

करने का यह बीड़ा किसने उठाया,

मेरे सपनों को यथार्थ का

आवरण किसने पहनाया।

मृदु पलकों से पिघल पिघल

जब भर जाता था मन का सरोवर,

उस सरसिज में ना जाने

इतने सरोज कैसे खिल पाया,

पुलकित मेरे दृगों में

किसने यह अंजन लगाया।

यामिनी सा सघन ये तम

जब जाती थी मैं सहम,

पर उसमें झिलमिल तारक का

किसने यह एहसास कराया,

मेरे इस बंजर मन पर

द्रुम सा हरित शाख लहराया,

पुलकित मेरे मन अब कह दे

किसने यह है राग सुनाया।

अश्रुपूरित इन लोचन में

जाने क्यों जिजीविषा जगाया,

इस गतिहीन सरोवर को

तिस्ता नदी सा चंचल बनाया

किसके स्पर्श से कमनीय हुयी काया

चुप ना रह मन अब तू कह दे

मेरा मन क्यों हर्षाया

किसने है यह राग सुनाया

फिर से वही बसंत क्यों छाया?

– सविता सिंह मीरा , जमशेदपुर

 

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