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भावनाएँ – रश्मि मृदुलिका

प्रेम गीतों की रागिनी हूँ मैं,
स्वर लहरियों की वाहिनी हूँ मैं,
सरिता सी बहने दो मुझे,
ठहरे हुए ,भय लगता है,
ऊंचे मुकाम नहीं चाहिए मुझे
छोटे घरोंदों में चित्त लगता है,
लघुतर स्वप्नों में जीने दो मुझे,
विस्तृत जमीं से, भय लगता है,
प्रेम आधार बन गया है मेरा,
ईश्वर के समीप हो गया है डेरा,
प्रेम में आकंठ डुब जाने दो मुझे,
शुष्क भावों से, भय लगता है|
अस्तित्व का एक टूकड़ा,
कौस्तुभ सा है मूल्य उसका,
मेरा अपना छोटा सा आसमां
टूटे पंखों से, भय लगता है|
रिश्तों को हृदय से लगाया है
घर – आंगन समर्पण से सजाया है|
उन्मुक्त हंसी की गूँज फैली है|
बहते अश्रूधारा से, भय लगता है|
– रश्मि मृदुलिका, देहरादून




