अंग-बंग की साझा विरासत: विलुप्त होती भागलपुर की जात्रा – कुमार कृष्णन

utkarshexpress.com – बिहार की सांस्कृतिक पहचान को समझने के लिए उन रंगमंचीय रूपों को याद करना जरूरी है, जो भाषा की सीमाओं से परे समाज को जोड़ते रहे। भागलपुर की बंगाली जात्रा ऐसी ही एक परंपरा है। यह केवल मनोरंजन नहीं, अंग और बंग की साझा सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण थी। कभी दुर्गापूजा की रातों में जात्रा के मंच सजते थे, कलाकार अपनी आवाज और अभिनय से दर्शकों को बांधे रखते थे। आज यह परंपरा लगभग विलुप्त है और इसका इतिहास बचाना बड़ी चुनौती है।
भागलपुर का भूगोल ही इस परंपरा की पहली कड़ी है। गंगा किनारे बसा यह क्षेत्र प्राचीन अंग प्रदेश की स्मृतियों से जुड़ा है। व्यापार और आवागमन ने इसे बंगाल की सांस्कृतिक धारा से जोड़ा। भाषा, पूजा-पद्धति, संगीत और रंगमंच में इस संपर्क के अनेक रूप दिखे। बंगाली जात्रा इसी साझा जीवन की अभिव्यक्ति थी।
बंगाल में जात्रा लोकनाट्य की वह शैली है जिसमें अभिनय, गायन और संवाद मिलकर कथा को जीवंत बनाते हैं। शुरू में इसमें कृष्णलीला और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति-परंपरा थी, बाद में इसने पौराणिक कथाओं के साथ सामाजिक अन्याय, शोषण और राजनीतिक चेतना को भी अपने कथ्य में शामिल किया। खुले मंच पर होने के कारण इसका दर्शकों से सीधा संवाद था। इसकी ताकत भव्य सज्जा में नहीं, कलाकारों की आवाज और कथा कहने की कला में थी।
भागलपुर में इसके इतिहास का उल्लेख उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से मिलता है। प्रकाशित विवरणों में 1880 को यहां जात्रा पार्टी की शुरुआत माना गया है। इस संदर्भ में राजा नारायण बनर्जी, शिवचंद्र खान, बैद्यनाथ चक्रवर्ती और चंद्रनाथ बनर्जी के नाम आते हैं। बाद में निमाई नियोगी, तीन कौड़ी घोष और चंद्र घोष द्वारा भागलपुर आर्य थिएटर के गठन का भी उल्लेख मिलता है।
भागलपुर की जात्रा की खासियत केवल पुरानी परंपरा में नहीं, प्रयोगों में भी थी। तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के बंगाली विभाग के पूर्व अध्यक्ष बिनॉय कुमार महाता ने इसे जात्रा का पुनर्जागरण कहा था। उनके अनुसार बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भागलपुर ने आधुनिक तकनीकों के साथ प्रयोग किए, जबकि तब बंगाल में पारंपरिक तरीकों का ही प्रभाव था।
महाता बताते हैं कि उस दौर में बंगाल में जुरी गान प्रचलित था, जिसमें दो कलाकार पूरी प्रस्तुति के दौरान मंच पर रहकर लोकगीतों पर आधारित युगल गीत गाते थे। भागलपुर में इसे बदला गया। पूरे समय कलाकारों को मंच पर रखने के बजाय केवल युगल गीत के समय लाने का प्रयोग किया गया, जिससे प्रस्तुति की गति और नाटकीय प्रभाव बढ़ा। इससे पता चलता है कि भागलपुर केवल अनुगामी नहीं, बल्कि अपनी जरूरत के अनुसार प्रयोग करने वाला रंगमंच था।
महाता ने स्वर्गीय सानू बनर्जी को यहां आधुनिक जात्रा का अग्रदूत बताया, जिनका संबंध फिल्म अभिनेता अशोक कुमार और किशोर कुमार के परिवार से बताया जाता है। तापस घोष के अनुसार 1960 के दशक के मध्य तक स्त्री पात्रों की भूमिकाएं लड़के ही महिलाओं की वेशभूषा में निभाते थे, जो उस दौर की सामाजिक मान्यताओं को दिखाता है।
दुर्गापूजा इस परंपरा के विस्तार का बड़ा अवसर थी। पूजा पंडालों के बीच रात-रात भर नाट्य-मंचन चलता था। बंगाल से आए कलाकारों के साथ स्थानीय रंगकर्मी भी जुड़ते थे। पूर्वी बिहार के पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज में भी बंगाल से ऐतिहासिक संपर्क रहा है। बंगाली समुदायों और दुर्गापूजा की परंपरा ने वहां रंगमंच के लिए सामाजिक आधार बनाया, हालांकि सांस्कृतिक संपर्क और नियमित मंचन को एक ही बात नहीं माना जा सकता। इसके लिए स्थानीय अभिलेखों की पड़ताल जरूरी है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का भागलपुर से जुड़ाव भी उल्लेखनीय है। उन्होंने जीवन का अहम समय यहां बिताया और शिक्षा पाई।
आज यह परंपरा संरक्षण के अभाव से कमजोर होती जा रही है। स्थानीय विवरण के अनुसार भागलपुर में जात्रा का आखिरी आयोजन 2002 में हुआ था, जिसमें तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आर.के. मिश्रा ने सहयोग किया था। बिहार बंगाली एसोसिएशन के सचिव रहे निरुपम कांति पाल के अनुसार आर्थिक-संगठनात्मक सहायता न मिलने से इसे जारी रखना संभव नहीं रहा।
यह केवल दर्शकों की रुचि बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता भी है जो अपनी लोकनाट्य विरासत को मंच नहीं दे सकी। पुराने पोस्टर, निमंत्रण-पत्र, पांडुलिपियां और गीत भी खो जाते हैं।
इसे बचाने के लिए बिखरे स्रोतों को जुटाना होगा। विश्वविद्यालय, इतिहासकार, रंगकर्मी और बंगाली संगठन मिलकर पुराने कलाकारों के साक्षात्कार दर्ज करें, पोस्टरों और तस्वीरों का डिजिटल अभिलेख बनाएं। साथ ही छोटे जात्रा-महोत्सव, अनुवाद, मंचन और युवा प्रशिक्षण से इसे नय एक भाषा में बंद नहीं है। (विनायक फीचर्स)




