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कुर्सी का खेल – अविनाश श्रीवास्तव

कुर्सी का खेल बड़ा निराला,
यहाँ हर कोई है मतवाला।
सत्ता की इस दौड़ में देखो,
अपना-पराया सब है हाला।
वायदों की मीठी बातें होतीं,
सपनों का बाजार सजाया जाता,
कुर्सी मिलते ही अक्सर फिर,
सब कुछ धीरे-धीरे भुलाया जाता।
कल तक जो थे साथ हमारे,
आज वही अनजान बने,
कुर्सी के खातिर लोग यहाँ,
रिश्तों के भी दाम तुले।
नीति-धर्म की बातें बहुत हैं,
पर पालन कम ही होता है,
कुर्सी की चाह में इंसान,
खुद से भी दूर हो जाता है।
पर याद रखो ऐ सत्ता चाहो,
ये खेल सदा न चलता है,
आज तुम्हारी बारी है तो,
कल कोई और संभलता है।
कुर्सी केवल साधन होना,
सेवा का आधार बने,
तभी सच्चे अर्थों में ये,
जनता का उपकार बने।
– अविनाश श्रीवास्तव
महराजगंज, उत्तर प्रदेश




