मनोरंजन

क्षणभंगुर – प्रदीप सहारे

खुला आसमां,

खुला समंदर।

झांक रहे थे,

मन के अंदर।

मन की चाहत

ले आई बरगी डैम।

सब कुछ था समंदर सा,

क्रूज संग अथाह पानी।

देख सब हुए रुमानी।

रोमांचित करता हर क्षण,

क्षण को समेटे यादों में,

मोबाइल के परदे में।

सब सोचते मन ही मन,

कितना सुंदर है जीवन।

जीवनदायी हवा का झोंका

बन गया एक बवंडर।

सोचा सबने — यह एक वंडर।

बदला वंडर चीख-पुकार में,

सब असहाय, लाचार।

माँ की ममता इतनी मजबूर,

आँखों के सामने सपने चूर।

प्रारब्ध कहें या जीवन रेखा,

काल को सबने सामने देखा।

अपने आप से, अपनों से,

हो गए सदा के लिए दूर।

सब जीवन है क्षणभंगुर।

– प्रदीप सहारे नागपुर,

महाराष्ट्र  – मोबाईल –

7016700769

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