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ग़ज़ल – रीता गुलाटी

बड़ी हसरतों से मै खोजूँ ड़गर,
मिले साथ तेरा हमे बस अग़र।
बढ़ी आज मँहगाई देखो इधर,
हकीकत मे कैसे करे हम गुज़र।
बढा लो कदम हो खुशी से ब़स़र,
बड़ी मुश्किलों से भरी है ड़ग़र।
हँसी आँख पलके लगे नौक खंजर,
बना जिस्म शीशे का चूमूँ अधर।
रहे साथ मेरे तुम्हारा प्यार ,
खुशी से कटेगा हमारा स़फर।
तुम्हें छोड़कर जाऊँ कहाँ यार ?
रहेगी सदा यार तुम पे ऩज़र।
छुपा लूँ मैं तुमको कि बाँहो मे अब,
बना लूँ मैं अपना हो जाऊँ अम़र।
– रीता गुलाटी ऋतंभरा, चण्डीगढ़




