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परिवार दिवस – राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

घर केवल ईंटों का ढांचा नहीं होता,

यह रिश्तों की धड़कनों से बना संसार होता।

जहाँ दादी की कहानी में चाँद उतर आता है,

और माँ की रोटी में पूरा प्यार समा जाता है।

जहाँ पिता की चुप्पी भी समझ बन जाती है,

भाई की शरारत भी याद बन जाती है।

बहन की हँसी जैसे सावन की फुहार,

परिवार से ही सजता जीवन का त्यौहार।

आज दुनिया मोबाइल में सिमट रही है,

पर अपनों की कमी फिर भी खटक रही है।

हजारों मित्र स्क्रीन पर मिल जाते हैं,

पर दुःख में अपने ही हाथ थाम पाते हैं।

विश्व परिवार दिवस हमें यही सिखाता है,

टूटा रिश्ता भी प्रेम से जुड़ जाता है।

न धन बड़ा, न ऊँचा मकान होता है,

सबसे अमीर वही, जिसका परिवार साथ होता है।

चलो आज फिर आँगन सजाएँ,

रूठों को अपने पास बुलाएँ।

हर घर में प्रेम का दीप जलाएँ,

“वसुधैव कुटुम्बकम्”का अर्थ निभाएँ।

क्योंकि परिवार केवल खून का रिश्ता नहीं,

यह विश्वास, अपनापन और दुआओँ का गहना है।

जिसके पास परिवार का साया है,

उसके जीवन में हर मौसम सुनहरा है।

-राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम, छत्तीसगढ़

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