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प्रकृति – कविता बिष्ट ‘नेह’

नवल किरण हैं झूमती, अपने प्रांगण आज।
रूप धरा का खिल उठा, सजे प्रकृति के साज।।
सजे बाग में कामिनी, करे मधुर मनुहार।
हुआ बसंती ये हृदय, कर गौरी श्रृंगार।।
भोर किरण को देखकर, सुंदर मन का साज।
सकल धरा मन मोहती, मिटता मन का त्रास।।
रंग-बिरंगा साज है, रूप अनोखा एक।
प्रकृति करे मनुहार जब, लगे जगत तब नेक।।
-कविता बिष्ट ‘नेह’, देहरादून , उत्तराखंड




