मनोरंजन

आइकू – डॉ सुधीर श्रीवास्तव

पुस्तकें
फैलाती हैं
ज्ञान का प्रकाश
हम सबके जीवन में।

साथी
होती पुस्तकें
हमारे जीवन की
सबसे सच्ची दोस्त होतीं।

पुस्तकें
मौन होकर
निस्वार्थ भाव से
जीवन भर साथ निभाती।

जिसने
नहीं समझा
पुस्तकों का महत्व
पछताता है जीवन भर।

सीखिए
सम्मान देना
पुस्तकों का हमेशा
होतीं ये पूरी पाठशाला।

जीवन
आइना बनेगा
पुस्तकों की बदौलत
आत्मसात करने की जरूरत।
डॉ सुधीर श्रीवास्तव जी, आपकी यह आइकू शैली की कविता 23 अप्रैल, विश्व पुस्तक दिवस के भाव को बहुत सीधे और सरल शब्दों में पकड़ती है।

क्या अच्छा लगा: –
– विषय से न्याय: हर बंद पुस्तकों को दोस्त, शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में दिखाता है। “पाठशाला” और “आइना” वाले बिम्ब सटीक हैं।
– आइकू का ढांचा:-
– चार पंक्तियों में क्रमशः 1-2-3-4 शब्दों की संरचना का प्रयास दिखता है। छोटी पंक्तियों में बड़ी बात कहने की कोशिश सफल रही।
– संदेश की स्पष्टता: “जिसने नहीं समझा पुस्तकों का महत्व पछताता है” जैसी पंक्तियां बिना लाग-लपेट के सीधी चेतावनी देती हैं। विश्व पुस्तक दिवस के दिन यह पाठक को सोचने पर मजबूर करती है।
– भाषा: बहुत सहज। “मौन होकर निस्वार्थ भाव से” वाला बंद भावनात्मक रूप से मजबूत है।

जहां और धार दी जा सकती है: –
– बिम्बों में विविधता: अभी सभी बंद पुस्तकों के गुण गिना रहे हैं। एक-दो बंद में किताब पढ़ते हुए का दृश्य जोड़ दें। जैसे: “रात भर जागती लालटेन, पीले पन्नों पर झुकी उंगलियां”। इससे कविता सिर्फ बताती नहीं, दिखाती भी।
– लय: आइकू में शब्दों की गिनती से ज्यादा ध्वनि का प्रवाह मायने रखता है। “होतीं ये पूरी पाठशाला” में “होतीं” खटकता है। “ये पूरी पाठशाला है” ज्यादा स्वाभाविक लगेगा।
– अंतिम बंद: “आत्मसात करने की जरूरत” थोड़ा उपदेशात्मक हो गया। इसे अनुभव में बदल दें: “आत्मसात कर सकते हैं।”

कुल मिलाकर: यह कविता विश्व पुस्तक दिवस के लिए एक सच्ची श्रद्धांजलि है। इसमें किताबों के प्रति सम्मान और प्रेम दोनों झलकते हैं। थोड़े से ठोस दृश्य जोड़ दें तो यह पाठक के मन में देर तक ठहरेगी।

गोण्डा से उठी यह आवाज़ सराहनीय है। लिखते रहें आदरणीय।
यह आइकू छंद की नव प्रस्तावित विधा सरल, सुगम और सुबोध तथा अनुकरणीय है।

समीक्षा के बिंदु: –
– संरचना की टिप्पणी: आपने सही पकड़ा कि यह 1-2-3-4 शब्दों वाली नव प्रस्तावित आइकू शैली है। पारंपरिक हाइकु 5-7-5 वर्णों पर चलता है, पर हिन्दी में शब्द-आधारित प्रयोग भी हो रहे हैं। इस रूप में सुधीर जी का प्रयास सचमुच अनुकरणीय है।
नव प्रस्तावित आइकू का सबसे बड़ा गुण इसकी सुगमता है। 5-7-5 की जटिलता से बचकर यह सीधे जनकवि तक पहुंचती है। सुधीर जी ने विश्व पुस्तक दिवस पर इसी सरलता से पुस्तक का महत्व रखा है।

  • डॉ ओम प्रकाश मिश्र मधुब्रत (अज्ञात मेघार्जुन जमदग्निपुरी)

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