मनोरंजन
खेल चल रहा था – ममता सिंह राठौर

अंतर्मन में कोई खेल चल रहा था।
फूल और कांटों का मेल चल रहा था।
सन्नाटें में भी शोर चल रहा था,
मन के भीतर चोर चल रहा था। .
जानकर वो अनजान चल रहा था,
खुद के डर को निडर कर रहा था।
कुछ दूर रास्ता इंतजार कर रहा था,
कोई तो था जो साथ चल रहा था।
किसी को आग से डर लग रहा था,
कोई जला कर मजा ले रहा था।
वो दर्द का इम्तिहान ले रहा था,
दिल को ये एहसास हो रहा था।
अब वक्त बोलता जा रहा था,
छुपे हुए राज खोलता जा रहा था।
-ममता सिंह राठौर,कानपुर, उत्तर प्रदेश




