शास्त्री जी…..जग में सुंदर हैं दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम – पवन वर्मा

utkarshexpress.com – > जग में सुंदर है दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम। > बोलो राम राम राम, बोलो श्याम श्याम श्याम। भारतीय जनमानस ने इस भजन को केवल गाया नहीं, जिया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण हमारे लिए दो अलग-अलग व्यक्तित्व नहीं, एक ही ब्रह्म की दो लीलाएँ हैं। एक मर्यादा में बंध कर सीख देता है कि राजा कैसा हो, तो दूसरा मर्यादा तोड़ कर सिखाता है कि प्रेम कैसा हो। पर जब इसी एकत्व पर कथावाचकों के मंच से ही प्रहार होने लगे, तो विवाद स्वाभाविक है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का ताजा बयान इसी पृष्ठभूमि में चर्चा में है।
क्या कहा गया शिवपुरी के मंच से? – 29 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में श्रीराम कथा चल रही थी। उसी कथा के दौरान पं. शास्त्री ने राम और कृष्ण की तुलना करते हुए कहा – “तुम अपने वाले ठाकुर जी की एक भी फोटो देख लो। खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े। पांव के ऊपर पांव, कहीं कमर लचकाए, टेढ़ी गर्दन करके बंसी बजाते हैं। हमारे वाले तो खड़े भी होते हैं तो एकदम सीधे। हमारे वाले का नाम भी सीधा, चलना भी सीधा, दिखते भी सीधे हैं। तुम्हारे वालों का नाम भी टेढ़ा, चलते भी टेढ़े, खड़े भी टेढ़े।”
उन्होंने आगे कहा – “बंसी बजाना तो खेल है, पर धनुष उठाना खेल नहीं। गाय चराना खेल है, बंदरों को नचाना खेल नहीं। तुम्हारे वाले ने पर्वत उठाया तो क्या बड़ी बात, हमारे भगवान के चेले हनुमान ने तो पूरा पर्वत ही उड़ा दिया। हमारा धाम अयोध्या सीधा, तुम्हारा वृंदावन टेढ़ा।”
यह वीडियो अलग अलग तरह से एडिट होकर सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और देखते ही देखते ब्रज के संतों से लेकर आम जनमानस तक में आक्रोश फैल गया।
आपत्ति क्यों उठी?- भारतीय मूर्तिकला में कृष्ण की त्रिभंग मुद्रा कोई दोष नहीं, सौंदर्य का शिखर है। तीन जगह से टेढ़ा खड़ा होना – पांव, कमर और ग्रीवा – यह काम-शास्त्र और भरत के नाट्यशास्त्र में सौंदर्य का मानक है। रसिक संप्रदाय इसी टेढ़ेपन को प्रेम का प्रतीक मानता है। ‘टेढ़ा’ शब्द कृष्ण के लिए गाली नहीं, गोपियों का सबसे प्रिय उलाहना है।
इसीलिए जब मंच से “तुम्हारे वाले और हमारे वाले” जैसा विभाजन हुआ, तो संतों को लगा कि यह सनातन की मूल एकता पर चोट है। अयोध्या के साकेत भवन के महंत सीताराम दास ने इसे “गुरु परंपरा में गहरे अध्ययन के अभाव और अज्ञानता से भरा बयान” तक कह दिया। उनका स्पष्ट मत था कि राम और कृष्ण दोनों एक ही हैं, दोनों में कोई भेद नहीं है।
राजनीति और कानूनी घेराबंदी – विवाद केवल धार्मिक नहीं रहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता कृष्ण कन्हैया पाल ने धीरेंद्र शास्त्री को मानहानि और धार्मिक भावना आहत करने का लीगल नोटिस भेजा, जिसमें बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग की गई है।
सांसद पप्पू यादव दिल्ली के संसद मार्ग थाने में एफआईआर दर्ज कराने पहुंचे, तो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर लिखा – “मानवीय भूलों के लिए तो क्षमा किया जा सकता है, ‘ईशनिंदा’ के लिए कभी नहीं। ऐसे दुष्मुखी लोगों पर आजीवन प्रतिबंध लगाना ही समाज के लिए श्रेयस्कर है।” तेजस्वी यादव, सहित कई अन्य नेताओं ने भी इसे अशोभनीय बताया।
धीरेंद्र शास्त्री की सफाई और माफी – विवाद बढ़ने पर धीरेंद्र शास्त्री ने नैरोबी, केन्या से एक वीडियो संदेश जारी किया। उन्होंने कहा – “बात विनोद, भाव और प्रेम में कही गई थी। इसका अर्थ अनर्थ न निकाला जाए। जैसे गोपियां प्रेम में श्रीकृष्ण को कपटी तक कह देती थीं, वैसे ही यह एक प्रचलित पद ‘बंसी बजाना तो खेल ही है, पर धनुष उठाना खेल नहीं’ की व्याख्या थी।” उन्होंने दोहराया कि वे स्वयं कृष्ण भक्त हैं, उनका नाम ही कृष्ण से जुड़ा है, वे कृष्ण जन्मभूमि के लिए आवाज उठाते रहे हैं, और यदि किसी की भावना आहत हुई हो तो वे क्षमा प्रार्थी हैं।
कथावाचकों की जिम्मेदारी – कथावाचक आज केवल धर्मगुरु नहीं, पब्लिक इन्फ्लुएंसर हैं। लाखों लोग लाइव सुनते हैं, करोड़ों क्लिप देखते हैं। ऐसे में “मैंने तो भाव में कहा था” कहना पर्याप्त नहीं। सार्वजनिक मंच से निकला एक वाक्य संदर्भ से कट कर पूरे समाज में आग लगा सकता है।
हमारी परंपरा ने तो सिखाया है कि राम गंभीर हैं तो कृष्ण चंचल हैं, राम मर्यादा हैं तो कृष्ण स्वतंत्रता हैं, पर दोनों विष्णु ही हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में और सूरदास ने अपने पदों में कभी एक को दूसरे से छोटा नहीं बताया। अयोध्या सीधी लगती है क्योंकि वह राजपथ है, वृंदावन टेढ़ा लगता है क्योंकि वह कुंजगली है पर दोनों गलियां उसी परमात्मा के घर जाती हैं।
आज जब समाज को राम की मर्यादा और कृष्ण के प्रेम, दोनों की आवश्यकता है, तब “हमारे वाले-तुम्हारे वाले” का भेद आत्मघाती है। धीरेंद्र शास्त्री की माफी का स्वागत होना चाहिए, पर माफी के साथ आत्मचिंतन भी जरूरी है।
आम भारतीय जनमानस तो सदियों से मानता आ रहा है कि जग में सुंदर दो ही नाम ही हैं। उन्हें चाहे राम कहो या कृष्ण, बात एक ही है। सनातन ने कभी देवों को बांटा नहीं, जोड़ा है। जरूरत है कि कथावाचक भी इस बात को समझें, यही भक्तों की अपेक्षा है, यही धर्म की मर्यादा भी। (विनायक फीचर्स)




