हरियाणवी लघुकथा का नया पड़ाव: ‘म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’

utkarshexpress.com – म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’ पहली बार देश-विदेश के 33 हरियाणवी लघुकथाकारों को एक मंच पर लाता है। 99 लघुकथाओं का यह अनूठा संकलन हरियाणा की माटी, लोकसंस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की सजीव झलक प्रस्तुत करता है। यह कृति युवा प्रेरणा स्रोत श्री मनुमुक्त ‘मानव’, आईपीएस की स्मृति को समर्पित है। डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के मार्गदर्शन में, डॉ. प्रियंका सौरभ द्वारा संकलित, डॉ. सत्यवान सौरभ द्वारा संपादित तथा सुरेंद्र बांसल द्वारा सुसज्जित आवरण के साथ यह पुस्तक 2026 में प्रकाशित हुई है। 121 पृष्ठों की इस कृति का मूल्य ₹275 है। हरियाणवी साहित्य प्रेमियों के लिए यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
— डॉ. विजय गर्ग
हर भाषा की असली ताकत उसकी माट्टी में छुपी होती है, और उसी माट्टी से जन्म लेते हैं उसके आखर। “म्हारी माट्टी, म्हारे आखर” इसी सोंधी सुगंध को समेटे एक ऐसा लघुकथा संकलन है, जो न केवल हरियाणवी बोली की जीवंतता को सामने लाता है, बल्कि साहित्य की उस प्रभावशाली विधा को भी मजबूती देता है, जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सबसे अधिक प्रासंगिक बन चुकी है—लघुकथा। यह संकलन डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’ के संपादन और डॉ. प्रियंका ‘सौरभ’ के संकलन में तैयार हुआ है, जिसमें 33 लघुकथाकारों की कुल 99 लघुकथाएँ शामिल हैं। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हरियाणवी लघुकथा के उभरते स्वरूप का संकेत है। लंबे समय तक हरियाणवी साहित्य मुख्यतः लोकगीतों, रागनियों और किस्सागोई तक सीमित रहा, लेकिन यह संकलन दिखाता है कि अब यह बोली आधुनिक साहित्यिक विधाओं में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने लगी है। लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संक्षिप्तता होती है, परंतु इस संकलन को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि यहाँ शब्द कम हैं, पर प्रभाव गहरा है। प्रत्येक रचना किसी एक घटना, भावना या सामाजिक स्थिति को केंद्र में रखकर लिखी गई है, जो पाठक को तुरंत अपने साथ जोड़ लेती है। ये कहानियाँ न केवल पढ़ी जाती हैं, बल्कि महसूस की जाती हैं—और यही इस संकलन की सबसे बड़ी सफलता है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत इसकी विषय-विविधता है। इसमें जीवन के अनेक रंग देखने को मिलते हैं—रिश्तों की मिठास, समाज की कटु सच्चाइयाँ, ग्रामीण जीवन की सहजता और बदलते समय की जटिलताएँ। “तड़कै की माँ” में मातृत्व की संवेदना झलकती है, “इज्जत की परिभासा” सामाजिक मानदंडों पर सवाल उठाती है, “बहू बिहार की” सामाजिक पूर्वाग्रहों को उजागर करती है, जबकि “माटी की सोंध” और “घूंघट अर घड़ी” जैसी रचनाएँ हरियाणा की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं।हरियाणवी भाषा की सादगी और उसका सीधा-सरल स्वभाव इन लघुकथाओं को और प्रभावशाली बनाता है। यहाँ भाषा में कोई बनावट या कृत्रिमता नहीं है, बल्कि एक सहज प्रवाह है, जो सीधे पाठक के मन तक पहुँचता है। यह संकलन इस धारणा को मजबूत करता है कि साहित्य की गहराई भाषा की जटिलता में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता में होती है।हालाँकि, इस पुस्तक का एक पहलू ऐसा भी है जो ध्यान आकर्षित करता है—भाषाई एकरूपता का अभाव। चूंकि इसमें कई लेखकों की रचनाएँ शामिल हैं, इसलिए हरियाणवी के अलग-अलग रूप सामने आते हैं। कहीं भाषा शुद्ध लोकधर्मी है, तो कहीं हिंदी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यह विविधता एक ओर संकलन को व्यापक बनाती है, लेकिन दूसरी ओर एक समान भाषिक प्रवाह की कमी भी महसूस होती है। फिर भी, इसे कमी के बजाय हरियाणवी के विकासशील स्वरूप की स्वाभाविक स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस संकलन की कई रचनाएँ सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं। “दोगला”, “कागजी समाज सेवा”, “लीडर”, “भीड़ अर नेता” जैसी लघुकथाएँ समाज में फैले पाखंड, दिखावे और खोखले नेतृत्व पर कटाक्ष करती हैं। वहीं “बेटी का मान”, “शेरनी माँ”, “लुगाइयां के हक” जैसी रचनाएँ स्त्री के संघर्ष, आत्मसम्मान और बदलती सामाजिक भूमिका को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों की विशेषता यह है कि ये बिना किसी अनावश्यक भावुकता के सीधे यथार्थ को सामने रखती हैं।इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें नए और अनुभवी दोनों तरह के रचनाकारों को स्थान दिया गया है। इससे न केवल साहित्यिक संतुलन बना है, बल्कि नए लेखकों को भी अपनी बात कहने का अवसर मिला है। यह प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी भाषा के विकास के लिए नई प्रतिभाओं का उभरना आवश्यक होता है।डॉ. रामनिवास ‘मानव’ की प्रस्तावना इस संकलन को एक वैचारिक आधार देती है। उन्होंने हरियाणवी लघुकथा की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों और संभावनाओं को जिस स्पष्टता से सामने रखा है, वह पाठक को इस विधा की गंभीरता का अहसास कराता है। वहीं सुरेंद्र बांसल का “रचनात्मक उद्यम नै साधुवाद” इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे एक सकारात्मक साहित्यिक पहल के रूप में स्थापित करता है।
यदि समग्र रूप से देखा जाए, तो “म्हारी माट्टी, म्हारे आखर” केवल एक लघुकथा संकलन नहीं, बल्कि हरियाणवी साहित्य के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यह उस खाली स्थान को भरने का प्रयास है, जहाँ अब तक बहुत कम काम हुआ है। यह संकलन न केवल वर्तमान लेखन को सामने लाता है, बल्कि भविष्य की संभावनाओं की ओर भी संकेत करता है।अंततः यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में पूर्णतः सफल है। यह पाठकों को केवल मनोरंजन ही नहीं देती, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और अपने समाज को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है। हरियाणवी भाषा के प्रेमियों के लिए यह एक अमूल्य कृति है, और साथ ही उन सभी के लिए भी, जो भारतीय लोकभाषाओं के साहित्य में रुचि रखते हैं।“म्हारी माट्टी, म्हारे आखर” वास्तव में अपनी माट्टी की खुशबू और अपने आखरों की ताकत को सशक्त रूप में प्रस्तुत करने वाला एक उल्लेखनीय साहित्यिक प्रयास है—जो हरियाणवी लघुकथा को एक नई पहचान और नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
पुस्तक समीक्षा-
पुस्तक विवरण एवं उपलब्धता
शीर्षक : म्हारी माट्टी, म्हारे आखर (हरियाणवी लघुकथा संकलन)
प्रकाशक : प्रज्ञानशाला, आर.के. फीचर्स (पंजी.), भिवानी (हरियाणा), भारत
आईएसबीएन : 978-81-998644-4-3
मूल्य : 275/-
पृष्ठ संख्या : 121
उपलब्धता : ऑनलाइन एवं ऑफलाइन
खरीदने का तरीका: –
प्रकाशक/संपादक से सीधे संपर्क करके प्राप्त करें
संपर्क नंबर: – 9466526148, 7015375570
ऑनलाइन खरीद: –
गूगल पर सर्च करें – “म्हारी माट्टी म्हारे आखर बुक”
–डॉ. विजय गर्ग (सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् व स्तंभकार) पता: स्ट्रीट कौर, चंद मार्ग, मलोट, पंजाब।




