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तुम ही शीर्षक – सविता सिंह मीरा

“इति लिख कर जब पलटीं आँखें,
जीवन की उस पुस्तक पर,
तो निष्कर्ष की हर एक बूंद में
शीर्षक बनकर तुम ही छलक रहे थे।”
अनभिज्ञ थी मैं स्वयं भी,
कि यह सब कैसे और कब हुआ?
पर हर वर्ण, हर शब्द, हर पंक्ति,
मौन रहकर बस तुम्हें ही रचते रहे।
हर अंतरा में तुम्हारी आहट थी,
हर भाव में तुम्हारा विस्तार,
मैं लिखती तो रही जीवन को,
पर उभरता रहा तुम्हारा आकार।
हृदय के धवल पृष्ठों पर,
तुम स्वतः ही अंकित होते गए,
और मैं अनुराग के जल से,
तुम्हें सींचती, संचित करती रही।
तब बोध हुआ इस परम सत्य का
मेरी सबसे सुंदर कृति,
मेरे जीवन की अक्षय निधि,
कोई कविता, कोई पुस्तक नहीं
प्रिय! तुम हो।
-सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर




