यम भैया का फोन (हास्य) – डॉ. शिखा गोस्वामी

utkarshexpress.com – सुबह-सुबह सो कर उठी थी। ब्रश करने जाने ही वाली थी कि तभी भैया का फोन आ गया। मैंने आँख मसलते हुए ही फोन उठाया और कहा, हैलो…
उधर से मेरे भैया बोले, हैलो, कैसी हो बहन…?
मैंने कहा, हैलो यम भैया, आप… प्रणाम भैया। मैं अच्छी हूँ, आप कैसे हैं?
तब उन्होंने कहा, मैं भी अच्छा हूँ। आज तेरी बहुत याद आ रही थी, सोचा बात कर लूँ।
मैंने कहा, मुझे भी आपकी बहुत याद आती है भैया, पर क्या करूँ… मिलना नहीं हो पाता ना।
उन्होंने कहा, हाँ बहन, सोच रहा था कुछ दिन के लिए तुझे यहाँ बुला लूँ। तेरी हर ख्वाहिश पूरी कर दूँ और ढेर सारे तोहफे देकर विदा करूँ।
मैंने कहा, आना तो मैं भी चाहती हूँ भैया, पर…?
उन्होंने कहा, पर क्या…?
मैंने कहा, पर भैया, मुझे आपके यमदूतों से बहुत डर लगता है…
उन्होंने कहा, पगली! मेरे रहते किसी से क्यों डरती है तू…? तू आएगी तो सबको जादू से सुंदर बना दूँगा… अब खुश?
मैंने कहा, हाँ, बहुत खुश… और… जो आप सबको भयानक दंड देते हो ना, वह भी मुझे मत दिखाना भैया, मुझे बहुत डर लगता है…
उन्होंने कहा, ठीक है बाबा, जैसी तेरी इच्छा। तू जो बोलेगी वैसा कर दूँगा… तू आ तो सही।
मैंने कहा, ठीक है, मम्मी से पूछकर बताऊँगी भैया…
वह उदास होते हुए बोले, अरे बाप रे! माताश्री से पूछोगी तो मेरी पेशी लग जाएगी।
मैं हँसते हुए बोली, इतना डरते हैं आप मेरी मम्मी से?
तब उन्होंने कहा, हाँ तो और क्या! पूरी दुनिया में सिर्फ दो ही लोगों से डरता हूँ—एक तो मेरे यार सुधीर की पत्नी अंजू भाभी से… और दूसरी मेरी बहन की माताश्री से।
मैंने हँसते हुए कहा, जिससे पूरी दुनिया डरती है, वह इन दोनों से डरते हैं।
फिर वह बोले, हाँ तो… और बता, क्या हाल-चाल है? सब कुशल-मंगल तो है ना धरती पर?
मैंने कहा, क्या बताऊँ भैया… आजकल बड़ी परेशानी है…
उन्होंने कहा, अरे, क्या हुआ?
मैंने कहा, अरे, वो राज्यों के युद्ध के कारण गैस सिलेंडर की आपूर्ति ठप हो गई है… और इसलिए सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है… अब हालात यह है कि चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है।
यम भैया बोले, ओह हो! यह तो बड़ी चिंता का विषय है…
फिर मैंने कहा, हाँ भैया… और ऊपर से भयंकर गर्मी… आपके ही पिताजी गुस्से में आजकल आग उगल रहे हैं। क्यों इतने क्रोधित हैं वे?
तब उन्होंने कहा, अरे क्या बताऊँ बहन, बहुत लंबी कहानी है…
मैंने कहा, कैसे? क्या हुआ?
उन्होंने कहा, पिताश्री का माताश्री से झगड़ा हो गया है, इसलिए पिताश्री अभी क्रोधित हैं…
मैंने कहा, क्या? चाचा-चाची में झगड़ा हो गया? कब, क्यों, कैसे?
उन्होंने कहा, एक दिन माताश्री ने पिताश्री से कहा कि आपके तेज को सहन करना बहुत मुश्किल है… इसके कारण मैं काली होती जा रही हूँ… तब पिताश्री बोले—हाँ तो क्या हो गया? धर्मपत्नी को पति के साथ ही चलना पड़ता है।
माताश्री बोलीं—मैं नहीं जा सकती, और मेरे पैर दर्द होने लगे हैं… आप ही अकेले दौड़िए अपने घोड़ों के साथ…
माताश्री की इतनी बात सुनते ही पिताश्री क्रोधित होकर माताश्री को वहीं छोड़कर चले गए…
यम भैया की बात सुनकर मैंने कहा, यह तो बहुत बुरा हुआ… अब उनका गुस्सा तो हमें भुगतना पड़ रहा है…
उन्होंने कहा, सुलह करवाने की कोशिश कर रहा हूँ, पर समय लग सकता है… जुलाई तक…
तब मैंने कहा, हाँ भैया, कृपया जल्दी सुलह करवा दीजिए… हमारा बुरा हाल है गर्मी से…
तब उन्होंने कहा, हाँ बहन…
फिर मैंने कहा, और बताइए भैया, यमपुरी के क्या हाल-चाल हैं?
उन्होंने कहा, सब बढ़िया है, पर अभी थोड़ा कार्य अधिक हो गया है… सबके कर्मों का लेखा-जोखा करना है बहन… लंबी कतार लगी है।
मैंने कहा, ओह हो! ऐसा क्या… और चित्रगुप्त भैया कैसे हैं? उनको प्रणाम कहिएगा मेरी तरफ से…
तब उन्होंने कहा, हाँ, जरूर कह दूँगा… वह अभी वहीं खातों की गणना करने में व्यस्त हैं… तू आएगी तो उन्हें थोड़ा कविता लिखना सिखा देना… तो मेरा मनोरंजन करते रहेंगे…
मैंने कहा, लिखना तो सिखा दूँगी भैया, पर उनके पास समय ही कहाँ रहता है जो कविता लिखेंगे…
उन्होंने कहा, हाँ, बात तो तेरी सही है…
मैंने कहा, अच्छा भैया, एक बात पूछूँ क्या आपसे?
तब उन्होंने कहा, हाँ, पूछ न… एक क्यों, दस पूछ ले…
मैंने कहा, नहीं, एक ही पूछूँगी… आपको सब ‘न्यायकर्ता’ कहते हैं और आप मुझे बहन बोलते हैं… फिर जब मैं आऊँगी तो मुझे स्वर्ग देंगे या नरक? क्योंकि पाप तो मैंने भी किए ही होंगे कभी ना कभी…
तब उन्होंने मेरी बात सुनकर कहा, यह तो बड़े ही असमंजस वाली बात पूछ ली बहन तुमने… सुन, बताता हूँ… मैं न्यायकर्ता हूँ, कर्मों के अनुसार अच्छा-बुरा फल देता हूँ… और यह भी देखता हूँ कि कर्म करते समय इंसान की भावना क्या थी। और जहाँ तक तेरी बात है… तुझे स्वर्ग नहीं दूँगा, तो नरक भी नहीं दूँगा… तेरे लिए तो यहीं यमलोक में एक कमरा बनवा रहा हूँ… वहाँ तुझे कोई परेशानी नहीं होगी… आराम से रहना… मुझे रोज नई-नई कविता-कहानी सुनाना… कहानी सुनते-सुनते सोऊँगा। दिनभर न्याय करते-करते दिमाग का दही बन जाता है। तू आएगी तो आधा काम तुझे दे दूँगा।
तब मैंने खुश होकर कहा, वाह! मेरे प्यारे, अच्छे यम भैया।
फिर उन्होंने कहा, अरे हाँ! मैं तो भूल ही गया था… तेरा पसंदीदा रंग कौन-सा है, बता तो?
मैंने पूछा, क्यों?
उन्होंने कहा, तेरे कमरे में सभी चीजें उसी रंग की रखूँगा, इसलिए पूछ रहा हूँ।
तो मैंने पूछा, तो क्या मुझे बुलाने ही वाले हैं आप?
तब उन्होंने कहा, अरे नहीं पगली… तुझे अभी धरती पर बहुत कुछ करना है… फिर सही समय पर यहाँ आना… तेरा स्वागत बहुत शानदार तरीके से होगा यहाँ। क्या है ना, मैं व्यस्त रहता हूँ… अभी समय नहीं मिलता… मैं खुद तेरे कमरे का सारा काम अपनी नजरों के सामने करवाऊँगा… तो समय तो लगेगा ही ना… इसलिए पूछ रहा हूँ।
तब मैंने कहा, हाँ, वो तो है। मेरा पसंदीदा रंग है—सतरंगी… इंद्रधनुष के सातों रंग पसंद हैं मुझे।
उन्होंने कहा, ठीक है, वैसा ही मिलेगा कमरा तुझे… और कुछ इच्छा हो तो बता देना।
मैंने कहा, आप मेरे लिए इतना सोच रहे हैं, यही बहुत है भैया, और कुछ नहीं चाहिए।
उन्होंने कहा, मेरी प्यारी बहन, चल अब ठीक है, फोन रखता हूँ। इधर क्रूज में डूबे मृतकों के कर्मों का आकलन करना है बहन, सब इंतजार में खड़े हैं।
तो मैंने कहा, ठीक है भैया।
फिर उन्होंने कहा, तू अपना ध्यान रखना, हाल-चाल बताती रहना अपना और हाँ, दवाई समय से खाया कर पगली, नहीं तो पिटेगी मेरे हाथ से।
मैंने हँसकर कहा, ठीक है मेरे प्यारे भैया, मैं समय से दवाई खाऊँगी। आप भी अपना ध्यान रखना और मेरी चिंता मत करना। आपके यार, यानी कि मेरे प्यारे सुधीर भैया हैं ना मेरी चिंता करने के लिए…
तब उन्होंने कहा, हाँ, ठीक बोली बहन… यार हो तो उसके जैसा। मेरे यार को भी बता देना कि मैं उसे याद कर रहा था। ठीक चल, बाय… रखता हूँ।
मैंने हँसकर कहा, बाय भैया।
-डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका”, छत्तीसगढ़




