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श्रमिक दिवस – डॉ अनमोल कुमार

ईंट पर ईंट धरता है,
महल खड़े हो जाते हैं।
पर उसके घर की छत,
बरसात में टपक जाती है।
वो हल चलाता है,
दुनिया का पेट भरता है।
पर उसकी थाली में,
आधा चाँद ही उतरता है।
सड़क बनाता, पुल बनाता,
लोहे को पिघलाता है।
पर उसके पैर में,
चप्पल फिर भी घिस जाती है।
1 मई आई है,
उसको भी याद करो।
जिसके पसीने की स्याही से,
किस्मत लिखी जाती है।
वो श्रमिक है, वो दधीचि है,
हड्डी गलाता है।
उसके श्रम का वज्र बने,
तभी भारत मुस्काता है।
कहो न उससे “मजदूर”,
वो तो “निर्माता” है।
धरती का असली मालिक,
वही हलधर दाता है।
संकल्प लो इस मई दिवस:
मोल पूरा देंगे उसका,
जो अनाज, मकान, कपड़ा देता है।
“श्रम को नमस्कार” कहेंगे,।
– डॉ अनमोल कुमार,झारखण्ड



