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मल्लिक (डोम) समाज : गरीब डोम से डोम राजा तक, इतिहास, वर्तमान और भविष्य का चिंतन – श्याम

utkarshexpress.com – बाँस की कलाकृति में हुनर, परंपराओं में पहचान और मेहनत में विश्वास रखने वाला मल्लिक (डोम) समाज भारतीय लोकजीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है.
भारतीय इतिहास और लोकपरंपराओं में मल्लिक, डोम तथा डोम राजा का उल्लेख अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ मिलता है. काशी के डोम राजा की परंपरा से लेकर स्वपच भक्त की भक्ति-कथाओं तक, इस समाज का जीवन संघर्ष, श्रम, लोकविश्वास और आत्मसम्मान के अनेक पहलुओं को सामने लाता है.
बाँस की कलाकृति से घर-घर तक अपनापन – बाँस और बाँस से बनी कलाकृतियों के निर्माण में मल्लिक (डोम) समाज का पारंपरिक कौशल उल्लेखनीय रहा है. लोकपर्व छठ पूजा में प्रयुक्त डाला, दौरा, सूप और अन्य बाँस के सामानों का निर्माण केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति को जीवित रखने वाली कला भी है.
शादी-विवाह में डाला, दौरा और पेटारी से लेकर पर्व-त्योहारों की तैयारियों तक, इस समाज के हुनर का संबंध लगभग हर घर की परंपरा से जुड़ा है. इनके हाथों से बनी वस्तुएँ बाजार ही नहीं, बल्कि परिवारों की सांस्कृतिक स्मृतियों में भी अपना स्थान रखती हैं.
#काशी के डोम राजा और सामाजिक इतिहास,काशी की धार्मिक परंपरा में डोम राजा का विशिष्ट स्थान रहा है. वाराणसी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट से जुड़ी परंपराओं में डोम समुदाय की भूमिका का उल्लेख मिलता है. अंतिम संस्कार की व्यवस्था में इनकी पारंपरिक भूमिका जीवन और मृत्यु से जुड़े सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है.
हिंदू लोककथाओं में राजा हरिश्चंद्र, श्मशान और डोम से संबंधित प्रसंग सत्य, कर्तव्य तथा मानवीय समानता की चर्चा करते हैं. इन कथाओं को ऐतिहासिक प्रमाणों से अलग रखते हुए उनके सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश को समझना आवश्यक है.
श्मशान में अंतिम संस्कार की परंपराओं से लेकर घरों में मांगलिक अवसरों पर बाँस की वस्तुएँ उपलब्ध कराने तक, इस समाज का जीवन अनेक सामाजिक आवश्यकताओं से जुड़ा रहा है.
विडंबना देखिए-जिस समाज की सेवाएँ जीवन के आरंभ से लेकर अंतिम यात्रा तक किसी न किसी रूप में दिखाई देती हैं, उसी समाज के अनेक परिवारों को लंबे समय तक सामाजिक उपेक्षा और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है.
#शिक्षा : सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत आधार..
आज समय बदल रहा है. मल्लिक (डोम) समाज की नई पीढ़ी के सामने भी शिक्षा, सरकारी सेवा, तकनीकी ज्ञान, स्वरोजगार और उद्यमिता के अनेक अवसर हैं.
समाज के जिन लोगों ने शिक्षा को अपना हथियार बनाया है, उन्होंने अपनी योग्यता और मेहनत से विभिन्न क्षेत्रों में पहचान बनाई है. यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है.
आवश्यकता है कि प्रत्येक परिवार अपने बच्चों को नियमित शिक्षा दिलाए, बालिकाओं की पढ़ाई को प्राथमिकता दे और युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीकी प्रशिक्षण तथा रोजगारपरक कौशल से जोड़े.
याद रखिए, पारंपरिक हुनर हमारी पहचान है, लेकिन आधुनिक शिक्षा हमारे भविष्य की नई उड़ान है.
#नशामुक्ति : मेहनतकश समाज की नई पहचान..
मल्लिक (डोम) समाज परिश्रम करने वाला समाज है.यदि इस समाज के लोग नशे से दूर रहने और अपने परिवारों को नशामुक्त बनाने का सामूहिक संकल्प लें, तो आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति की राह और मजबूत हो सकती है.
इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम जरूरी हैं-
@परिवार में शराब, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों से दूरी बनाने का संकल्प लें.
@युवाओं को खेलकूद, शिक्षा, रोजगार और सकारात्मक सामाजिक गतिविधियों से जोड़ें.
@नशे पर खर्च होने वाली राशि को बच्चों की पढ़ाई, बचत और स्वरोजगार में लगाएँ.
@नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति का अपमान करने के बजाय उसे सहयोग और उचित उपचार के लिए प्रेरित करें.
#गाँव-टोले में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और नशामुक्ति के लिए सामूहिक बैठकें आयोजित करें.
जब परिवार जागरूक होगा, तभी समाज मजबूत होगा; और जब समाज मजबूत होगा, तभी आने वाली पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल होगा.
#सामाजिक सम्मान और आर्थिक आत्मनिर्भरता
किसी समाज की प्रतिष्ठा केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान के कार्यों और भविष्य की उपलब्धियों से भी तय होती है.
मल्लिक (डोम) समाज के पारंपरिक बाँस-शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने, उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने, उचित मूल्य दिलाने और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से रोजगार के अवसर विकसित करने की जरूरत है.
साथ ही, समाज के युवाओं को डिजिटल शिक्षा, सरकारी योजनाओं की जानकारी, बैंकिंग सुविधाओं और उद्यमिता से जोड़ना चाहिए। सामाजिक संगठनों को भी शिक्षा सहायता, प्रतिभा सम्मान और जरूरतमंद परिवारों के सहयोग के लिए आगे आना चाहिए.
@भविष्य की ओर : नई सोच, नई दिशा
इतिहास हमें अपनी जड़ों से परिचित कराता है, वर्तमान हमें अपनी कमजोरियों को पहचानने का अवसर देता है और भविष्य हमें अपनी दिशा चुनने की प्रेरणा देता है.
मल्लिक (डोम) समाज की असली शक्ति उसके श्रम, कौशल, पारिवारिक एकजुटता और संघर्ष करने की क्षमता में है. जरूरत है कि इन शक्तियों को शिक्षा, नशामुक्ति, संगठन और आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ जोड़ा जाए.
आइए, हम ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें, जहाँ कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे, कोई परिवार नशे की वजह से बर्बाद न हो, किसी हुनरमंद को उसकी मेहनत का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष न करना पड़े और किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित न होना पड़े.
मल्लिक (डोम) समाज की गौरवशाली लोकपरंपराओं को सम्मान मिले, वर्तमान पीढ़ी को समान अवसर मिलें और आने वाली पीढ़ी को शिक्षा एवं प्रगति का नया आकाश मिले-यही समय की माँग है.
बाँस का हुनर हमारी विरासत, शिक्षा हमारी ताकत, नशामुक्ति हमारा संकल्प और सामाजिक सम्मान हमारा अधिकार है.
आइए, मिलकर एक शिक्षित, नशामुक्त, संगठित और आत्मनिर्भर मल्लिक (डोम) समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें

.-  श्याम किशोर, मुजफ्फरपुर -बिहार

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