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गजल – नीलकान्त सिंह नील

सबके सब वे पराए हुए।

जो भी हमारे अपने रहे।।

दोस्त यार भाई बहन नहीं

धुएँ को गले लगाए रहे।।

कसमें जितनी खाईं हमनें

हर वक्त वे शर्मिंदा रहे।।

किए रहे जितने भी वादे

जलसों में सर झुकाए रहे।।

बह रहे जो अश्क थे मेरे

अनजानों से कम नहीं रहे।।

पढ़ डाले थे सभी किताबें

फ़साने सुने-सुनाए रहे।

-नीलकान्त सिंह नील,बेगूसराय, बिहार

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