मनोरंजन

70 विभिन्न छन्दों पर आधारित संग्रह का लोकार्पण और विमर्श आयोजन- संगीता चौबे, अबूहलीफा, कुवैत

utkarshexpress.com – प्रवासी भारतीय कुवैत की सुप्रसिद्ध कवयित्री संगीता चौबे पंखुड़ी के छंद आधारित माँ शारदे वंदना संग्रह ‘माँ अक्षरा वीणा बजा रही है’ का लोकार्पण और पुस्तक चर्चा, अमेरिका के समृद्ध मंच किताबें बहुत कुछ कहतीं हैं पर किया गया l मंच की संस्थापक रचना श्रीवास्तव के रोचक और सशक्त संचालन ने कार्यक्रम में अंत तक सभी वक्ताओं और श्रोताओं को बाँध कर रखा । मुख्य वक्ता छन्दों के ज्ञाता आदरणीय प्रेम बिहारी मिश्र जी ने इस स्तुति संग्रह की विशेषता बताते हुए कहा गया कि इसमें विभिन्न 70 छंदों पर आधारित विविध भावों को समेटे 70 वाणी वंदनाएँ हैं जो इसे उच्च स्तरीय बनाती हैं। पंखुड़ी के इस संग्रह में कुल 70 सरस्वती वंदनाएँ समाहित हैं, जिनमें केवल स्तुति या प्रार्थना ही नहीं बल्कि सर्जना और साधना के उस अदृश्य पुल की अनुभूति है जो भारत की माटी से आरम्भ होकर दूर देशों की हवाओं तक फैला है। उनकी ये वंदनाएँ हमें स्पष्ट रूप से यह अनुभव कराती हैं कि ज्ञान और कला की ज्योति भौगोलिक सीमाओं से नहीं बँधती और जहाँ कहीं भी वह प्रज्ज्वलित होती है, वहीं सरस्वती का नाद गूँजता है। इन वंदनाओं में सरस्वती केवल देवी नहीं, बल्कि प्रेरणा हैं — वह चेतना जो कवयित्री के शब्दों में संगीतमय प्रवाह बनकर उभरती है। ये वंदनाएँ कभी आरती बनकर झिलमिलाती हैं, कभी ध्यान बनकर मन को स्थिर करती हैं, तो कभी आत्मसंवाद बनकर भीतर की निस्तब्धता को मधुर वाणी देती हैं। कवयित्री के लिए सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कार और सृजन की अनन्त प्रतीक हैं। उनके शब्दों में जितनी कोमलता है, उतनी ही दृढ़ता भी — जैसे हिमालय की निष्ठा और गंगा की करुणा एक साथ प्रवाहित हों।
अनूठा प्रयास है, अद्भुत पुस्तक है| वैसे तो पंखुरी जी का पारंपरिक छंद विधानों पर आधारित गीत संग्रह भी आ चुका है किन्तु वहाँ हर गीत का विषय भिन्न होगा किन्तु यहाँ एक ही विषयवस्तु पर 70 कविताएँ और वे भी 70 भिन्न-भिन्न पारंपरिक छंद के विधान पर आधारित, मुझे तो जादू से कम नहीं लगता| और तो और, पंजाबी लोक धुन माहिया में भी वन्दना है… यहाँ तक कि जापानी काव्य विधा तांका को भी नहीं छोड़ा| रोला जैसे छन्द में एक बिलकुल सटीक गीत की रचना है जिसका मुखड़ा है

“जला ज्ञान का दीप, हृदय आलोकित कर दे // मिटा अहम् का भाव शारदे माता वर दे”…

वर माँगा है कि मिटा अहम् का भाव… कवयित्री की भावना सचमुच अभिनंदनीय है| रोला विधान के अनुसार इस गीत की प्रत्येक पंक्ति में यति से पूर्व और पश्चात त्रिकल भी है और आवश्यक कल विन्यास में भी कमी ढूंढे से भी नहीं मिलती|
हिन्दी काव्य के लिए यह वंदना संग्रह सुकून की साँस दिलाने वाली है जिसमें लुप्त होते हुए अनेक अन्य पारंपरिक छंद समाहित है, जो वर्तमान समय की एक बहुत बड़ी आवश्यकता है| कुछ अन्य छंदों की बात करूँ तो घनाक्षरी छंद के विषय में कहना चाहूँगा कि हम आम तौर पर मनहरण घनाक्षरी को ही सम्पूर्ण घनाक्षरी मान लेते हैं और, उस छंद में भी 8,8,8,7 वर्णसंख्या के नियम को धता बता कर 16,15 की धड़ल्ले से छूट लेते रहते हैं| इस पुस्तक में पंखुरी जी ने 10 प्रकार के घनाक्षरी छंदों में से पाँच को समाहित किया है वह भी शुद्ध विधान के अनुसार जो हैं… कलाधर, जलहरण, मनहरण, रूप और सूर घनाक्षरी| यही बात सवैया के साथ भी है| हम 20 प्रकार के सवैया में से केवल मतगयंद को ही सम्पूर्ण सवैया मान लेते हैं बहुत हुआ तो दुर्मिल| पंखुरी जी ने यहाँ तीन सवैया छंदों को सम्मिलित किया है… मतगयंद, दुर्मिल और मदिरा सवैया| ये तो जाने-माने छंदों की बात हुई, 70 छंद हैं तो मेरे जैसे आदमी ने तो बहुत से छंदों के नाम तक नहीं सुने होंगे| इस प्रकार से, केवल नवोदित कवियों को ही नहीं कई स्थापित कवि भी इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे, पुस्तक से चाहे कोई भी रचना उठा लीजिए छंद विधान का अक्षरशः पालन किया गया है| कथ्य की बात करें तो आम तौर पर हमारी वन्दनाओं में माँग ही माँग भरी होती है… माँ मुझे यह दे दे माँ मुझे वह दे दे किन्तु पंखुरी जी की इन सभी रचनाओं में माँ की स्तुति है, विनय है और दोनों में अनुपम सम्मंजस्य बिठाया गया है| सब से बड़ी बात तो यह है कि इस संग्रह की सभी वन्दनाएँ लोक कल्याण की भावना से लिखी गई हैं| मैं तो चाहता हूँ कि पंखुड़ी जी की इस अनूठी पुस्तक को विश्व कीर्तिमान हेतु भेजना चाहिए, कम से कम India book of world records को तो भेजनी ही चाहिए… ।हम सभी की शुभकामनाएँ आपके साथ हैं|
अब अपनी पसंद की रचनाओं में से एक वंदना की बात आती है तो प्रमाणिका वार्णिक छंद में रचित एक वंदना है, जिसमे एक कठिन छंद विधान को कवयित्री ने बड़ी आसानी से और बहुत ही मनोरम तरीके से निभाया है, शब्दावली तत्सम है किन्तु सहज, सुगम और आकर्षक है| प्रथम तीन छंदों में माँ की स्तुति है और बाद के पाँच छंदों में विनय| छंद का पिंगल सूत्र है – जगन+रगन+ल गु अर्थात 121+212+12,,

सुशोभना सुमंगला ।
सुदीर्घ नेत्र चंचला ।।
सुबुद्धि की प्रदायिनी ।
नमामि हंसवाहिनी ।।

सुलक्षणा सुभाषिनी ।
सुसंस्कृता सुहासिनी ।।
सुपंकजा निवासिनी ।
सुरेख लेख दायिनी ।।

दुबई की वरिष्ठ एवं प्रबुद्ध साहित्यकार डॉ. आरती ‘लोकेश’ ने अभिव्यक्त किया कि संगीता चौबे पंखुड़ी जी की पुस्तक ‘माँ अक्षरा वीणा बजा रही हैं’ पर दृष्टि पड़ी तो हटी ही नहीं। इतना मोहक आवरण, मनभावन रंग-सज्जा, स्तुत्य शीर्षक; सब कुछ जैसे छप गया हृदय पर। आवरण पर जैसे मां शारदा से संबन्धित कोई चिह्न कोई वस्तु अछूती नहीं छोड़ी है कलाकार ने। पृष्ठ भाग के आवरण पर संगीता जी की प्यारी सी मुस्कान लिए मुख-मुद्रा और उनका परिचय बेहद प्रभावी है।

कवि कहते हैं काव्य, वेदना का गीत है,
शब्द चमत्कार ही, कविता का मीत है,
सरस सरल भाव माँ, पादुका में अर्पित
संगीता चौबे की वंदना दिव्य संगीत है।

माँ सरस्वती की 70 विभिन्न छंदों में वंदना लिख कर संगीता ने अति महान कार्य किया है। आज तक साहित्य में ऐसी स्तुति और प्रार्थना भाव सेवा का अनुभव नहीं किया गया होगा। प्रथम तो छंद बद्ध रचना करना ही अपने आप में आश्चर्य और आकर्षण का विषय है, उस पर एक ही विषय पर 70 वंदनाएँ लिखना एक कीर्तिमान स्थापित करने जैसा है। यह पुस्तक छंदकारों के सामने एक नया बेंचमार्क खड़ा करती है। इस पुस्तक को विश्व कीर्तिमान में शामिल होना चाहिए। इसका निर्माण स्वयं माँ शारदा की प्रेरणा से ही संभव है।
भाषा और वर्तनी की शुद्धता भी देखते ही बनती है। गेयता और संगीतात्मकता तो ऐसी है कि मानो नवनीत में लपेटकर सारे शब्द गढ़े गए हैं, कंठ पर आते ही फिसलते चले जाते हैं। पंक्तियाँ पढ़ते हुए भी ऐसा आभास हो रहा था कि कोई इन्हें गा रहा है, कान में गुनगुना रहा है।
वैसे तो इस पुस्तक समग्र का पठन-मनन कर एक मीमांसा रची जा सकती है किंतु अभी समय की माँग इसकी पर समीक्षात्मक प्रकाश डालने का है। इस पुस्तक की वंदनाओं में से अपनी प्रिय पंक्तियों को तलाश उन पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं-
‘बजा कर तार वीणा के, हठीला स्वर सुरीला कर’
विधाता छंद रचना में रची यह पंक्ति काव्यात्मक सौंदर्य और गहन भावाभिव्यक्ति से युक्त है। यह मुझे कबीरदास जी तक खींच ले गई। यहाँ किसी कठोर, जिद्दी अथवा असंयमित स्वर को वीणा के तारों को बजाकर मधुर और सुरीला बनाने की बात कहता है। आशय यह है कि साधना, संगीत, प्रेम या संवेदना के माध्यम से कठोरता को भी कोमलता और मधुरता में परिवर्तित किया जा सकता है। अनुभव हुआ कि इसमें अहंकार मिटा कर मीठी वाणी का संदेश छिपा हुआ है।

‘शिक्षा की जलाएँ जोत, रोजगार के हों स्रोत’

जलहरण घनाक्षरी छंद में वंदना की यह पंक्ति मुझे सबसे प्रिय लगी कि इसमें सारे विश्व के लिए प्रगति और उन्नति की कामना की गई है। आशय है कि समाज में शिक्षा का प्रकाश फैलाया जाए, क्योंकि शिक्षा ही ज्ञान, जागरूकता और प्रगति का आधार है। साथ ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे रोजगार के अवसर उत्पन्न हों और व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सके। शिक्षा और रोजगार, दोनों मिलकर समाज और राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

‘तान सुना मधु मोहक रुचिकर, आनन पे मुसकान खिलाती’

मतगयंद सवैया छंद पढ़ते हुए तो लगा कि रसखान को ही पढ़ रही हूँ।–
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
वही गेयता, वही माधुर्य, वही मधुरिम धुन कान में गूँज गई। संगीत की मधुरता मानव-हृदय को आनंद और आकर्षण से भर देती है। इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग इसे इस वंदना की श्रेष्ठ पंक्ति बना गया है।

‘हृदय में बीज विद्या दान के बोती’

सिंधु छंद की यह पंक्ति मनुष्य के लिए उन दो आवश्यक कर्म विद्या और दान की बात करती है कि शिक्षा और ज्ञान का दान मनुष्य के हृदय में श्रेष्ठ संस्कारों और उज्ज्वल भविष्य के बीज बोने के समान है। विद्या का प्रसार व्यक्ति के जीवन को प्रकाशित करता है तथा समाज में सद्भाव, जागरूकता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। अगर मनुज इन दो लोकमंगल भावों को ही अपना ले तो ही भाव सागर तर जाए।

‘सन्मार्ग पर चलते रहें सद्बुद्धि का वरदान दो’

हरिगीतिका छंद की यह पंक्ति मुझे बहुत भायी, जिसमें वरप्रदा माँ से सत्य के कल्याणकारी मार्ग पर चलने की प्रार्थना की गई है। संगीता जी प्रार्थना करती हैं कि मनुष्य सदैव सत्य, नैतिकता और धर्म के मार्ग पर चलता रहे तथा उसे ऐसी सद्बुद्धि प्राप्त हो जिससे वह सही और गलत का विवेक कर सके। यह पंक्ति मानव जीवन में अच्छे विचारों और आदर्श आचरण के महत्व को व्यक्त करती है।

‘शुद्ध पावन ज्ञान दात्री,
ताल-लय यति गति प्रदात्री’

मनोरम छंद में वंदना की यह पंक्ति मन को छू गई। देवी सरस्वती अथवा ज्ञान और संगीत की अधिष्ठात्री शक्ति की स्तुति करते हुए कवयित्री कहती हैं कि वे शुद्ध और पवित्र ज्ञान प्रदान करने वाली हैं। साथ ही वे संगीत में ताल, लय, यति और गति जैसी कलात्मक विशेषताओं की भी दात्री हैं। उनके कृपा-प्रभाव से जीवन में ज्ञान, संतुलन और सौंदर्य का विकास होता है। इसमें यति गति का प्रयोग बहुत भाया जो कि पंक्ति को प्रवाह तो प्रदान कर ही रहा है साथ ही विरोधार्थी शब्द-युग्म का सुंदर उदाहरण तुकांत के साथ प्रस्तुत कर रहा है।

‘अर्थ सब तुमसे उदित तुम, शब्द की माला; व्याकरण नियमावली का खोलती ताला’

रजनी छंद ज्ञानदायिनी माता से भाषा की कितनी सुंदर बात सामने रख रहा है। यहाँ ज्ञान एवं वाणी की स्रोतवाहिनी देवी सरस्वती की स्तुति करते हुए वे कहती हैं कि समस्त अर्थ, शब्द और भाषा की शक्ति उन्हीं से उत्पन्न होती है। वही शब्दों को सुंदर माला के रूप में पिरोती हैं तथा व्याकरण के नियमों और भाषा के रहस्यों को समझने की क्षमता प्रदान करती हैं। सच है कि माता की कृपा से ही व्याकरण की नियमावली का ज्ञान और व्यवहार संभव है।

‘बोलूँ जब तुम मेरी जिह्वा पर उतरो,
आशीषों का हस्त शीश पर सदा धरो’

रास छंद में रची यह पंक्ति एक सरस सरल सुगम हृदय से निकली पंक्ति प्रतीत होती है। बहुत ही मिठास इसमें झलकती है। जब भी वह बोले, उसकी वाणी में देवी का वास हो, ताकि उसके शब्द मधुर, ज्ञानपूर्ण और कल्याणकारी बनें, एक पावन हृदय ही ऐसी बात कह और लिख सकता है।
‘कलम उठे जब भी कभी, दे सार्थक संदेश । समुचित शब्दों में रखे, अपने तर्क विशेष ।।

दोहा छंद में लिखे गई ये पंक्तियाँ या यह दोहा जैसे मेरे ही मन के भावों को संगीता जी के शब्दों में पिरो लाया। लेखनी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज-निर्माण का साधन माना गया है। लेखक को अपने विचारों और तर्कों को उचित, संतुलित और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि उसका लेखन सकारात्मक संदेश देने वाला, जनहितकारी और प्रेरणादायक बन सके।

‘कथ्य शिल्प का नवीन श्लेष दो, मातु शारदे कृपा विशेष दो’

श्योनिका छंद की ये अंतिम पंक्तियाँ मानो पूरी वंदना का सार बन आई हैं। इस कविता का ही नहीं, समस्त काव्य जगत के लिए एक आदर्श रचना प्रक्रिया का द्योतक है। माता शारदा (सरस्वती) से प्रार्थना है कि वे साहित्यिक सृजन में नवीनता, कलात्मकता और अर्थगर्भिता प्रदान करें। रचना का कथ्य (विषय-वस्तु) और शिल्प (अभिव्यक्ति शैली) प्रभावशाली बने।

‘निरक्षर जगत में मनुज इक न हो, कथन भी अनर्गल अनैतिक न हो’

शक्ति छंद में यह कितनी सुंदर पंक्तियाँ गढ़ी हैं संगीता ने। एक और बात जो एक रचनाकार और सजग नागरिक रूप में मुझे भा गई- ‘निडर हो लिखे वह खबर सनसनी’ कितनी सार्थक सीख हमारे मीडिया समाज और पत्रकार समूह को इस वंदना के माध्यम से मिल रही है। कामना है कि संसार में कोई भी मनुष्य अशिक्षित न रहे। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति सही ज्ञान और विवेक से वंचित रह जाता है। साथ ही रचयिता यह भी चाहती हैं कि मनुष्य की वाणी निरर्थक, असत्य या अनैतिक न हो, बल्कि वह सदैव मर्यादित, सार्थक और नैतिक मूल्यों से युक्त हो।

‘उर शुचितामय दीन सहायक पावक सा वरदान मिले’

कनक मंजरी छंद में रची इस वंदना में यहाँ ‘पावक’ शब्द का प्रयोग बहुत सुंदर और महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है। ‘पावक’ यानी अग्नि को पवित्रता प्रदान करने वाली ज्वाला के रूप में माना जाता है और यहाँ माँ से शुचिता का आग्रह किया गया है। बहुत पावन विचारों का यहाँ उद्गम हुआ है।

‘नवनीत नहीं इसमें अब शेष, मथो यह जीवन तथ्य यथा’
वाह! दुर्मिल सवैया छंद में कितनी गहरी बात यहाँ कही गई है। ऐसा मथ दो जीवन तथ्य को कि सारा नवनीत बाहर आ जाए, भीतर कुछ शेष न रहे, यानी जीवन का गूढ़ रहस्य सभी कुछ इस विश्व में, समाज में प्रकट हों, सभी उसे जान सकें, अमल कर सकें। इस एक पंक्ति से दर्शन का निचोड़ टपक रहा है।

‘शब्द कोष सब तुमसे बढ़ते,
अक्षर-अक्षर जब हम पढ़ते ।

इस गहन चौपाई में न केवल माँ पद्माक्षी की महिमा का वर्णन है अपितु अक्षर-अक्षर समझकर पढ़ने का महत्त्व भी साथ ही रेखांकित है। यह वंदना तो विद्यार्थियों को स्कूल में गानी और गुननी चाहिए। माता के लिए पद्माक्षी अर्थात् ‘कमल जैसी आँखों वाली’ विशेषणात्मक संज्ञा का प्रयोग भी बहुत भाया।
आल्हा छंद में वंदना ‘शब्दों का दे दो भंडार’ इतने प्रवाहपूर्ण और सरल कविता है कि बालक भी सुविधा से इसे गा ले और हंसवाहिनी मातु शारदे का आशीर्वाद ले ले।

‘कष्ट से विदीर्ण प्राण, जीभ सत्य ही कहे’

कलाधर घनाक्षरी छंद की यह पंक्ति हमें कितनी बड़ी शिक्षा दे रही है जो हमारी कवयित्री संगीता शारदे माँ से वंदना रूप में कह रही हैं। मेरे सामने वे सभी दृश्य उपस्थित हो गए जब मनुष्य कष्टों से हार कर असत्य, मिथ्या प्रलाप और अन्याय का वरण कर लेता है। यह वंदना कदाचित उन्हें कुछ सम्बल और हौसला दे जाए।

‘सेवा जन की कर पीर हरूँ, हो दु:ख भरे दिन धैर्य धरूँ’

मोटनक छंद की यह वंदना रबींद्रनाथ टैगोर की कविता आत्मत्राण की मुझे याद दिला गई-
दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दु:ख को मैं कर सकूँ सदा जय।
ऐसा नहीं लगा कि मैं एक कवयित्री को पढ़ रही हूँ, लगा कि एक संतनाम साध्वी को, एक विवेकी मनीषी को, एक परोपकारी उदार हृदय को पढ़ रही हूँ।
उनकी यह पुस्तक छंद ज्ञान सीखने की इच्छा रखने वालों के लिए एक पाठशाला भी है क्योंकि 70 छंदों के नाम ही नहीं इसमें उसका विधान भी दिया गया है। अनुक्रमणिका में ही दिए गए एक-एक छंद की रचना की विशेषताओं पर दृष्टि डाल यदि उस छंद में माँ अक्षरा पर संगीता जी द्वारा लिखी गई वंदना को पढ़ लें तो उस छंद के विषय में ज्ञान का प्रकाश जाग्रत होने लगेगा, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है।
अमेरिका से जुड़े वरिष्ठ साहित्यकार और वैज्ञानिक डॉ. कौशलेंद्र टिंगी ने पंखुड़ी जी को बधाई देते हुए इस स्तुति संग्रह को लोक कल्याणकारी बताया । और स्तुति संग्रह के शीर्षक से वे अत्यंत प्रभावित हुए विशेषकर अक्षरा शब्द से और उन्होंने तुलसीदासजी द्वारा रचित पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि पुस्तक का शीर्षक बहुत विशिष्ट और अलग हट कर है। …”वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि”
अर्थात्‌ अक्षरों (वर्णों), अर्थ-समूहों, रसों, छंदों और मंगलों (कल्याण) को करने वाले—उत्पन्न करने वाले—सरस्वती (वाणी) की मैं वंदना करता हूँ। कौशलेंद्र जी ने इस स्तुति संग्रह की विशेषता बताते हुए कहा कि इसमें न केवल सभी स्तुतियाँ छन्दबद्ध हैं, बल्कि अनुक्रमणिका में शीर्षक के साथ सभी छन्दों का विधान भी प्रस्तुत किया गया है, जो छन्द सीखने वाले विद्यार्थियों/ कलाकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी है। इसके लिए उन्होंने पंखुड़ी जी को हार्दिक साधुवाद और अनेकानेक बधाईयाँ व्यक्त की।
कतर की सुप्रसिद्ध कवयित्री शालिनी गर्ग ने विचार व्यक्त किये कि संगीता चौबे पंखुड़ी …एक ऐसी साहित्यकारा जिनकी यह पुस्तक ‘माँ अक्षरा वीणा बजा रही हैं’ बता देती है कि किस तरह संगीता जी छंदो की पावन गंगा मे डुबकी लगा रहीं हैं। और हर बार एक नए छंद से माँ वागेश्वरी का श्रंगार कर रही हैं। 70 छंदो से माँ सरस्वती की स्तुति संगीता जी का एक नवीनतम अनुपम प्रयास है। विभिन्न छंदो में हमने साझा पुस्तक तो देखी हैं कि सब दो-दो चार-चार छंदो पर लिख कर विभिन्न छंदों का साझा संकलन तैयार कर लेते है। पर अकेले ही संगीता जी ने हर छंद पर अध्ययन किया, मनन किया और माँ अक्षरा की वंदना में अर्पित किया। हर छंद पर लेखनी चलना बहुत कठिन काम है, आपको माँ सरस्वती का आशीर्वाद मिला और आपकी मेहनत रंग लाई। आपकी यह पुस्तक छंद सीखने वालो के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी ।
संस्थापिका/संचालिका रचना श्रीवास्तव के अनुपम संचालन ने कार्यक्रम में प्रश्नों के माध्यम से रोचकता बनाये रखी। देश-विदेश से जुड़े अनेकानेक साहित्य मनीषियों ने लाइव कार्यक्रम से जुड़कर इसका लाभ लिया और संगीता चौबे पंखुड़ी को उनकी इस काव्य कृति की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित की।

  • संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’, अबूहलीफा, कुवैत

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